त्वरित टिप्पणी :यह बीजेपी की बड़ी हार है

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दिनेश तिवारी .


यह बीजेपी की बड़ी हार है . यह मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की बड़ी पराजय है . मंगलौर और बद्रीनाथ उपचुनाव जीतकर कांग्रेस ने प्रदेश में भाजपा को ज़ोर का झटका ज़ोर से दिया है . इस अनहोनी को होनी में बदल कर प्रदेश कांग्रेस ने अपने हिस्से के सूखे , निराशा , हताशा को ख़त्म करने की दिशा में क़दम बढ़ा दिया है . यह लगातार भयंकर सूखा झेल रही कांग्रेस के जीवन में अमृत वर्षा है . हालाँकि यह चुनाव परिणाम लगभग अनुमानों के क़रीब हैं . मंगलौर सीट कभी भी भाजपा के खाते में रही नहीं यहाँ हमेशा बसपा और कांग्रेस का ही आधिपत्य रहा है . मुस्लिम , दलित , पिछड़ा और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों का गठबंधन और उनकी बहुतायत इस सीट पर भाजपा के लिए अभी तक मुश्किलें ही पैदा करती रही है . और इस सीट को जीतना भाजपा के लिए अभी भी एक दिवास्वप्न ही है . इस लिहाज़ से मंगलौर उपचुनाव में कांग्रेस की जीत अप्रत्याशित नहीं है . यह कांग्रेस की अपने गढ़ को बचाए रखने की बड़ी कामयाबी है . मगर बद्रीनाथ सीट ? यह अभूतपूर्व है . अनुमानों के विपरीत है . और अभी तक हिंदी बेल्ट में मौजूद ट्रेंड्ज़ के उलट है . इस चुनाव परिणाम ने बता , दिखा और सिखा दिया है कि भाजपा अजेय नहीं है . उसका क़िला अभेद्य नहीं है और उसका हर प्रयोग हर बार सफल नहीं हो सकता . कहा जा सकता है कि बद्रीनाथ विधान सभा सीट पर भाजपा के स्थानीय कार्यकर्ता और नेतृत्व कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए राजेंद्र भंडारी से बिल्कुल भी ख़ुश नहीं था , और वहाँ भारी असंतोष और गहरी नाराज़गी मौजूद थी , जिसका लाभ कांग्रेस ने शानदार तरीक़े से उठाया और सबको चौंकाते हुए विजयी गोल दाग़ दिया .पर कारण जो भी हो जीत तो जीत है . यही लोकतंत्र की ख़ासियत है . और वाक़ई आज का दिन कांग्रेस का है . उसके प्रदेश नेतृत्व का है . वह वाक़ई बधाई के हक़दार हैं .
अभी तक तो यही माना जा रहा था कि हिंदी बेल्ट में और वह भी हिंदू बहुल इलाक़ों में भाजपा अजेय है . और यह भी कि प्रदेश में जिस पार्टी की सरकार होती है उपचुनाव वही पार्टी जीतती है या जीतती रही है , हालाँकि इसके अपवाद भी कम नहीं हैं और कई बार तो ख़ुद मुख्यमंत्री उपचुनाव हारे हैं . मसलन , 1971 में गोरखपुर के मानीराम विधान सभा उपचुनाव में यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री टीएन सिंह कांग्रेस के प्रत्याशी रामकृष्ण द्विवेदी से चुनाव हार गए थे . यह भारत के इतिहास का पहला मौक़ा था जब कोई मुख्यमंत्री उपचुनाव हारा था .
. तो क्या उपचुनाव के परिणाम मुख्यमंत्री धामी के लिए ख़तरे की घंटी हैं ? लगता तो यही है कि धामी के विरोधी इस हार का ठीकरा मुख्यमंत्री के माथे पर फोड़ेंगे और प्रदेश में नेतृत्व बदलने की माँग और कोशिश करेंगे .
दिनेश तिवारी . पूर्व उपाध्यक्ष ,विधि आयोग उतराखंड सरकार .