उत्तराखंड के आंचलिक, राजनैतिक,गैर राजनैतिक संगठनों को पहाड़ की आंचलिक अस्मिता बचाने के लिए आगे आना होगा

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विधि आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष दिनेश तिवारी एडवोकेट ने कहा है कि उत्तराखंड राज्य में आंचलिक राजनैतिक और ग़ैर राजनैतिक संगठनों को परम्परागत राजनैतिक सोच से बाहर निकल कर उत्तराखंड राज्य का नेतृत्व संभालने की आवश्यकता है । कहा कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन और अन्य सामाजिक आंदोलनों से बनी उत्तराखंडी पहचान का प्रश्न इस दौर में नेपथ्य में चला गया है और जनविरोधी विकास की अवधारणा ने आँचलिक अस्मिताओं की लड़ाइयों को कमज़ोर कर दिया है । कहा कि समाज को एक जन पक्षीय आक्रामकता की सख़्त ज़रूरत है और यह काम हर वक़्त बचाव की मुद्रा में खड़ा नेतृत्व नहीं कर सकता। कहा कि पहाड़ में सरकारी नियमों को ठेंगा दिखाकर सारे ‘ विकास’ कार्य हो रहे हैं । ज़िक्र किया कि राज्य का पर्यटन कारोबार राज्य के पर्यटन मानकों की ही उपेक्षा कर रहा है और केंद्र द्वारा बनायी गयी ईको टूरिज़्म की बेसिक गाइड लाइन का पालन तो बहुत दूर उसकी पर्यटन विभाग को जानकारी तक नहीं है । कहा कि चर्चित अंकिता भंडारी मर्डर केस में मुख्य अभियुक्त पुलकित आर्य का वनंतरा रिज़ॉर्ट पर्यटन नियमों के तहत पंजीकृत नहीं है । आरोप लगाया कि घने जंगलों और हिमालय की गोद में बनाए गए रिज़ॉर्ट न तो नेशनल ग्रीन ट्रीब्यूनल की गाइड लाइन का पालन कर रहे है और न ही ईको टूरिज़्म और प्रदेश की पर्यटन नियमों का पालन कर रहे हैं । कहा कि पहाड़ के कोने कोने में पहाड़ों की ज़मीन के सौदागर , खनन कारोबारी , बिल्डर , कालोंनायजर , शराब के धंधेबाज अपना साम्राज्य फैला रहे हैं ।

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कहा कि राज्य की प्रमुख जल विद्युत परियोजना से लेकर सड़कों के निर्माण और रखरखाव का काम भी बड़ी कम्पनियों के हवाले है । आरोप लगाया कि सरकारी नीतियों के संरक्षण में उत्तराखंड की अपार प्राकृतिक सम्पदा लूटी और बेची जा रही है . कहा कि राज्य में यह कहने वाला राजनैतिक नेतृत्व किसी भी स्थापित राजनैतिक पार्टियों के पास नहीं है जो कह सके कि बने हुए नियमों , मानकों के अतिरिक्त एक इंच भर अधिक छूट किसी को नहीं मिलेगी । कहा कि पहाड़ों की अस्मिता का प्रश्न भले ही गौण बना दिया गया हो पर राज्य में , ख़ासकर पहाड़ में पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है ।

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