भू-कानून के हल्ले के बीच,भू-कानून को समझना भी ज़रूरी है

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आजकल उत्तराखंड में भू क़ानून और चकबंदी का मुद्दा फिर से सुर्ख़ियों में है। हो भी क्यों नहीं ,इस सवाल ने पिछले दो दशकों से उत्तराखंड के जनमानस को बेहद उद्वेलित और असमंजस में डाला हुआ है ।यह एक राजनैतिक प्रश्न बनकर लगातार हमारी सियासत को भी कटघरे में खड़ा करता रहा है तो पहाड़ी समाज की अंतर्चेतना और ज़मीर को भी झकझोरता रहा है। अब जब कि राज्य में विधान सभा चुनाव दस्तक दे रहे हैं तब राज्य की ज़मीनों को बचाने के लिए एक सशक्त भू क़ानून और चकबंदी लागू करने की माँग चौतरफ़ा उठने लगी है ।
यह सच है कि पहाड़ में राज्य बनने से पहले और फिर बाद में राज्य से बाहर के लोगों की विशाल जमात ग्रामीणों की ज़मीनों पर क़ाबिज़ हो गयी है और यही हाल यहाँ के काम धंधों के मामले में भी है मसला फिर चाहे पर्यटन का हो खनन या शराब के कारोबार का या फिर निजी मेडिकल पैरामेडिकल संस्थानों के निर्माण का या राज्य में हवाई ट्रांसपोर्ट या फिर सड़क परिवहन लाभ कमाने के हर फ़ील्ड में राज्य से बाहर के लोगों का क़ब्ज़ा हो गया है। यह बेहद दुखद और चौंकाने वाला तथ्य है कि देहरादून, हरिद्वार ऋषिकेश, काशीपुर ,हल्द्वानी ,रूद्रपुर से लेकर नैनीताल भीमताल मुक्तेश्वर रानीखेत अल्मोड़ा कौसानी जागेश्वर पौड़ी ग़ैरसैेण,श्रीनगर ,टिहरी ,उत्तरकाशी ,चमोली पिथौरागढ़, मसूरी, चम्पावत यानी कि राज्य का कोई ऐसा कोना नहीं है जहाँ राज्य से बाहर के बिल्डरों कालोनाईजरों ने अपने दानवी पैर नहीं फैलाये हों ।राज्य की भू- सम्पदा हो या फिर खनिज जल -जंगल या फिर धार्मिक पर्यटन या पर्यटन का कारोबार सब जगह इन लोगों का खुला दख़ल पहाड़ के लोगों के लिए परेशानियों का सबब बनता जा रहा है ।

यह जानना और दिलचस्प है कि कोरोना महामारी के बाद के दौर में राज्य से बाहर के लोगों का सैलाब पहाड़ों में भूमि ख़रीदने के लिये उमड़ता हुआ दिख रहा है। कोरोना के डरावने दौर से सहमी हुई यह जमात पहाड़ों को अपने लिये सुरक्षित पा कर तमाम क़ानूनी प्रतिबंधों तटबंधों को बाढ़ की तरह खाती हुई पहाड़ में धमक रही है। पहाड़ में बसने की इच्छा लेकर आने वालों के अलावा राज्य से बाहर के लोगों की एक ऐसी जमात भी है जिसे यहाँ बेशुमार दौलत कमाने की सम्भावना नज़र आती है ।यह चिंता का कारण तो है ही विरोध और संघर्ष का आधार भी बन रहा है ।ज़ाहिर है कि राज्य से बाहर के लोगों की टिड्डियों की तरह पहाड़ की ज़मीनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर हमलावर यह जमात पहाड़ की पहचान ,सामाजिक ताने -बाने ,रीति रिवाज और आर्थिक गतिविधियों के लिये भी मुसीबत बनती ज रही है ।इस परिस्थिति से पहाड़ का भूगोल भले ही बदले या न बदले पर बाहरी और बड़ी पूँजी का यह आक्रमण पहाड़ के समाज मिज़ाज को बदल रहा है और यहाँ के उद्योग धंधों पर क़ाबिज़ होते हुए अब राजनैतिक अर्थशास्त्र की परिभाषा भी अपने फ़ायदे के हिसाब से गढ़ रहा है ।अपनी बेशुमार दौलत कमा कर देने वाली ज़मीनों को ओने -पौने दामों पर बाहर के लोगों को बेचकर पहाड़ छोड़ तराई में जा कर बस रहे स्थानीय लोगों के कारण पहाड़ों का राजनैतिक प्रतिनिधित्व भी प्रभावित होने की कगार पर है। नियम यह है कि राज्य में आवासीय प्रयोजन के लिये कोई व्यक्ति २५० वर्गमीटर ज़मीन ख़रीद सकता है लेकिन एक ही परिवार के अलग अलग सदस्यों या दो या दो से अधिक सदस्यों के नाम से ज़मीनें बेची जा रही हैं या फिर ख़रीदी जा रही हैं ।यहाँ यह ज़िक्र भी ज़रूरी है कि प्रदेश में आंशिक व स्वैच्छिक चकबंदी को क़ानूनी मान्यता दे दी गयी है लेकिन इसे अनिवार्य नहीं किया गया है ।अभी तक राज्य में केवल पौड़ी गढ़वाल के तीन गांवों में चकबंंदी का नोटिफ़िकेशन हुआ है जिसमें पूर्व सी एम त्रिवेंद्र सिंह रावत का गाँव खैरा यू पी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गाँव पंचूर और कृषि मंत्री सुबोध उनियाल का गाँव आऊनी शामिल है ।
यहाँ यह जानना भी ठीक रहेगा कि २१ मई २०२० को चकबंदी नियमावली राज्य कैबिनेट में पास हो गयी है और राजस्व विभाग द्वारा नियमावली का प्रकाशन भी कर दिया गया है ।उत्तराखंड राज्य के वजूद में आने के बाद राज्य में उत्तरप्रदेश ज़मींदारी विनाश एवम भूमि सुधार अधिनियम १९५० लागू किया गया है ।उत्तराखंड में वर्ष २००२ में पंडित नारायण दत्त तिवारी सरकार में बाहरी व्यक्तियों के लिये भूमि ख़रीद की सीमा ५०० वर्ग मीटर तय की गयी बाद में खंडूरी सरकार के समय वर्ष २००७ में यह सीमा घटा कर २५० वर्ग मीटर कर दी गयी लेकिन ऐसा नहीं था कि ज़मीन के कारोबारियों ने इस क़ानून में छेद नहीं ढूँढ़े अनेक तरीक़े निकाल कर पहाड़ों की ज़मीन राज्य से बाहर के लोगों के सुपुर्द की जाती रही है ।उत्तराखंड राज्य की ज़मीनों के लिये वर्ष २०१८ काला वर्ष के रूप में देखा पढ़ा और समझा जाना चाहिये राज्य सरकार ने पूँजीपतियों और बिल्डरों के पक्ष में शर्मनाक समर्पण करते हुए वर्ष २०१८ में विधानसभा के शीतकालीन सत्र में उत्तरप्रदेश ज़मींदारी विनाश एवम भूमि सुधार अधिनियम १९५० में बिल्कुल ग़ैरज़रूरी संशोधन पास करवा दिये इस संशोधन के द्वारा विधेयक में धारा १४३( क) जोड़ कर यह प्रावधान कर दिया कि औद्योगिक प्रयोजन के लिये भूमिधर स्वयं भूमि बेचे या फिर उससे कोई भूमि क्रय करे तो इस भूमि को नान एग्रिकल्चर करवाने के लिये अलग से कोई प्रक्रिया नहीं अपनानी पड़ेगी औद्योगिक प्रयोजन के लिये ख़रीदे जाने पर उसका भूमि उपयोग स्वतः ही बदल जायेगा और वह अकृषि ग़ैर कृषि हो जायेगा। इस अधिनियम में सबसे अधिक आपत्तिजनक धारा १५४(२) जोड़ कर औद्योगिक प्रयोजन के नाम पर पर्वतीय क्षेत्रों में भूमि ख़रीद की सारी सीमाओं को समाप्त कर दिया और पहाड़ के पूरी तरह बिकने का मार्ग खोल दिया गया। राज्य से बाहरी लोगों कारोबारियों ने इस क़ानून का लाभ उठाकर राज्य में बेशुमार ज़मीनें ख़रीद ली हैं लेकिन उद्योग लगाने के नाम पर ख़रीदी गयी इन ज़मीनों पर आज दिन तक किसी उद्योगपति ने एक पत्थर तक नहीं लगाया है ।
इसी परिस्थिति में यह आवाज़ उठ रही है या कि उठती रही है कि पहाड़ों की ज़मीनों को बचाने के लिये हिमांचल राज्य की तर्ज़ पर भू क़ानून बनना चाहिये तब यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि हिमांचल राज्य के इस चर्चित और आदर्श माडल की तरह पेश किए जा रहे भू क़ानून की पड़ताल की जाये और देखा जाये कि आज इस भू क़ानून की वास्तविक दशा दिशा क्या है ।हिमांचल प्रदेश के निर्माता और पहले मुख्यमंत्री डॉक्टर यशवंत सिंह परमार सरकार ने वर्ष१९७२ में हिमांचल प्रदेश टेनेन्सी एंड लैंड रेफ़ोर्म्ज़ ऐक्ट १९७२ के ज़रिये हिमांचल के लिये एक विशेष भू क़ानून बनाया इस ऐक्ट के ११वें चेप्टर कंट्रोल आन ट्रांसफ़र आफ लैंड में धारा ११८ के तहत ग़ैर कृषकों को ज़मीन बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया साथ ही इस ऐक्ट में यह प्रावधान भी कर दिया कि ऐसे किसी भी व्यक्ति को भूमि ट्रांसफ़र नहीं की जा सकती है जो कृषक नहीं है ।डॉक्टर परमार ने यह विशेष भू क़ानून इस लिये तैयार और लागू करवाया ताकि दूसरे प्रदेशों के पैसे और रसूखदार लोग हिमांचल प्रदेश की ज़मीनें न ख़रीद सकें। ७० के दशक में हिमांचल की अर्थव्यवस्था बहुत ख़राब थी और ग़रीबी के कारण हिमांचल का दम घुट रहा था डॉक्टर परमार को यह आशंका थी कि ग़रीबी में डूबे हुए हिमांचल के वाशिंदे अपनी ज़मीनें बेच सकते हैं और भूमिहीन हो सकते हैं ।एक अनुभव से गुज़रते हुए डॉक्टर परमार ने यह पाया कि किसानों ने जिन बाहरी लोगों को अपनी ज़मीन बेची अब वह लोग उन्हीं धनकुबेरों के यहाँ नौकरी कर रहे हैं यही वो परिस्थिति थी जिसमें डॉक्टर परमार सरकार इस भू क़ानून को लाने के लिये प्रेरित हुई। लेकिन आज हक़ीक़त यह है कि डॉक्टर परमार का यह भू क़ानून अनेक संशोधनों के बाद बेअसर कर दिया गया है। हिमांचल में कांग्रेस सरकार ने हिमांचल प्रदेश किरायेदारी और भूमि सुधार अधिनियम १९७२ में पाँच बार संशोधन किये हैं और इस क़ानून की धारा ११८ जो भूमि का हस्तांतरण ग़ैर किसानों हिमनचलीय या ग़ैर हिमांचलीय को करने से रोकती है में यह व्यवस्था दे दी गयी है कि राज्य सरकार की अनुमति के बिना ऐसा हस्तांतरण नहीं किया जा सकता। यानी कि सरकार चाहे तो अनुमति दे सकती है जो आज की परिस्थिति मे असरदार लोगों के लिये प्राप्त करनी कोई बड़ी बात नहीं है इस अधिनियम में संशोधन के बाद उपखण्ड २जी ग़ैरकृषक अनुमति के बिना हिमांचल प्रदेश आवास और शहरीविकास प्राधिकरण से घर बनाने के लिये घर या ज़मीन ख़रीद सकते हैं यह अधिनियम जंगल आदिवासी परम्पराओं और छोटे मंझोले किसानों के हितों की रक्षा के लिये बनाया गया था लेकिन अब अधिनियम में प्रावधान कर दिया गया है कि राज्य सरकार से अनुमति मिलने के बाद कोई भी राज्य में ज़मीन ख़रीद सकता है।

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हिमांचल प्रदेश के भू क़ानून के बारे में केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर का हाल में दिया गया यह बयान असलियत बयान करता है कि हालाँकि धारा ११८ राज्य से सम्बंधित है फिर भी मैं यह अस्पष्ट करना चाहता हूँ कि वास्तविक ख़रीददार राज्य सरकार की अनुमति हासिल करने के बाद हिमांचल प्रदेश में ज़मीन ख़रीद सकते हैं पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी द्वारा हिमांचल प्रदेश उत्तराखंड और जम्मू कश्मीर के लिये घोषित एक विशेष पैकिज का ज़िक्र करते हुए कहा कि उस समय हिमांचल प्रदेश में ज़मीन हासिल करने में उद्योगपतियों को कोई कठिनाई नहीं हुई थी कोई भी वास्तविक ख़रीददार जो हिमांचल में निवेश के लिये या मकान बनाने के लिये ज़मीन ख़रीदना चाहता है वह बिना किसी कठिनाई के ज़मीन ख़रीद सकता है हिमांचल के अलावा मेघालय , सिक्किम राज्यों का भू क़ानून भी बेरोक टोक भूमि की बिक्री पर प्रतिबंध लगाता है बहरहाल राज्य को एक सशक्त भू क़ानून की ज़रूरत लगातार महसूस की जाती रही है ताकि पहाड़ों की पहचान सुरक्षित रह सके।

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(लेखक एडवोकेट हैं एवं उत्तराखंड विधि आयोग के उपाध्यक्ष रहे हैं)

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