नीति नियंता, प्रशासक, उद्यमी और राजनीतिज्ञ थे केदार सिंह फोनिया .

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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला


गढ़वाल हिमालय की नीति घाटी का एक गांव है गमसाली ( समुद्रतल से ऊंचाई 10000 फीट )। यहां के लोग अप्रैल से सितम्बर तक गमसाली और अक्टूबर से मार्च तक छिनका गांव में रहा करते हैं। ( यद्यपि अब इस प्रचलन में बहुत कमी आयी है। ) भारत – चीन युद्ध ( सन् 1962 ) से पहले गमसाली गांव गढ़वाल से पश्चिमी तिब्बत की ओर किए जाने वाले व्यापार का प्रमुख केन्द्र था। यहीं के प्रतिष्ठित दम्पति माधोसिंह – कृष्णा देवी के पुत्र केदार सिंह फोनिया जी का जन्म 27 मई, 1930 को गमसाली में हुआ।गांव के प्राथमिक विद्यालय में कक्षा 4 तक पढ़ने के बाद 5 से 7 तक केदार की शिक्षा जोशीमठ में हुई। पारिवारिक परिचित विद्यादत्त जी के साथ आगे की पढ़ाई के लिए जून, 1944 में 9 दिन निरंतर पैदल चलने के बाद गमसाली गांव से पौड़ी पहुंचा 14 वर्षीय केदार पूरे एक साल तक घर वापस नहीं आया। मेसमोर हाईस्कूल, पौड़ी से सन् 1948 में दसवीं ( प्रथम श्रेणी ) एवं डी. ए. वी, देहरादून से सन् 1951 में इंटर ( प्रथम श्रेणी ) करने बाद सन् 1953 में बीएससी और सन् 1955 में ‘प्राचीन भारत का इतिहास एवं भारतीय दर्शन’ विषय में एमए की उपाधि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने हासिल की। इलाहाबाद से सन् 1955 में एमए करने के तुरंत बाद नौकरी की तलाश में फोनिया जी का दिल्ली आना हुआ। अप्रैल, 1956 में पर्यटन विभाग, भारत सरकार में सूचना सहायक के पद पर चयन के उपरान्त उनकी प्रथम नियुक्ति बनारस में पर्यटन सूचना कार्यालय में हुई। बौद्ध धर्म एवं दर्शन में गहन जानकारी उनके काम आई। मात्र 2 साल में उनकी बहुमुखी प्रतिभा को पहचानते हुए पर्यटन विभाग ने सन् 1958 में उनकी तैनाती बनारस से कोलम्बो ( श्रीलंका ) में स्थित भारतीय दूतावास कार्यालय में कर दी थी। कोलम्बो से सन् 1962 में सहायक निदेशक, पर्यटन के पद पर वे दिल्ली स्थानान्तरित हुए। सन् 1962 में भारत – चीन युद्ध के दौरान पूरे देश में पर्यटन गतिविधियां ठ्प्प होने के कारण अन्य सरकारी अभिकर्मियों की तरह फोनिया जी को भी देश की ‘टेरिटोरियल आर्मी’ का सैनिक बना दिया गया। देश की स्थितियां सामान्य होने बाद वे अपने पूर्ववत सरकारी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने लगे थे। वर्ष- 1963 में उन्होने 4 माह का अवैतनिक अवकाश लेकर निजी कम्पनी ‘नेपाल टेवल एजेन्सी’, काठमांडू में बतौर संस्थापक मैनेजर काम किया। देश में पर्यटन विकास को नया आयाम देते हुए सन् 1965 में भारतीय पर्यटन विकास निगम ( आईटीडीसी ) का गठन किया गया। फोनिया जी आईटीडीसी के उत्तरी क्षेत्र के संस्थापक प्रबंधक पद पर नियुक्त हुए। उनकी कार्यकुशलता रंग लाई और वे वर्ष 1966 में 8 माह के अन्तराष्ट्रीय पर्यटन डिप्लोमा, प्राग ( चेकोस्लोवाकिया ) के लिए चयनित हो गए। प्राग, चेकोस्लोवाकिया में डिप्लोमा प्रशिक्षार्थी के रूप में उन्हें जिनेवा, फ्रैंकफर्ट, पेरिस और लंदन की अध्ययन यात्रा करने का अवसर मिला।प्राग ( चेकोस्लोवाकिया ) से वापस आने के बाद देश के प्रमुख पर्यटन नीति -नियंताओं में उनकी पहचान बनने लगी। मार्च, 1967 में वे अपने घर छिनका आये तो जोशीमठ में होटल बनाने की धुन सवार हो गई। देश – दुनिया से हासिल अनुभवों और ज्ञान ने उन्हें अपने पैतृक परिवेश में उद्यमिता की एक नई राह बनाने की ओर प्रेरित किया। इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ते हुए वर्ष – 1968 से होटल ‘नीलकंठ’ जोशीमठ में सफलतापूर्वक संचालित होने लगा। नौकरी से इतर एक स्थानीय उद्यमी के रूप में उनकी पहाड़ी जीवन से अब और नजदीकियां होने लगी। फोनिया जी के मन – मस्तिष्क में बार – बार यह विचार कौंधता कि यूरोप से भी अधिक नैसर्गिक सुंदरता को लिए हमारे उत्तरांखड के लोगों का जन – जीवन इतना विकट क्यों है? क्षेत्र के समग्र विकास की राजकीय नीतियों में दूरदर्शिता का अभाव इसका प्रमुख कारण उनकी समझ में आता था। बस, इसी सूत्र से उनके जीवन की डगर ने करवट बदली। युवा – प्रफुल्लित फोनिया जी के मन – मस्तिष्क ने एक नया सपना देखा। और उस सपने को साकार का समय भी बिल्कुल सामने ही था।उत्तर प्रदेश में जनवरी – फरवरी, 1969 में मध्यावधि विधानसभा चुनाव घोषित हुए। फोनिया जी को लगा जीवन का सर्वोत्तम वे राजनीति में योगदान देकर हासिल कर सकते हैं। करीबी मित्रों ने हौंसला दिया और वे निर्दलीय विधायक प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ने राजनीति के मैदान में उतर गए। राजनीति की चालाक राह व्यक्ति को लालच और भ्रम में रखती हुई सरल दिखती तो जरूर है पर उसकी दुरूहता को जीतने की कला कुछ विरलों के पास ही होती है। राजनैतिक तिकड़मबाजी की कला से वे बहुत दूर थे। लिहाजा फोनिया जी चुनाव हार गए। अब सारा ध्यान उन्होने होटल व्यवसाय में लगाना शुरू किया। बिडम्बना देखिए, जून, 1970 में बेलाकूची की तबाही और जून 1971 को गौंणाताल के टूटने से सीमान्त क्षेत्र का सारा जन – जीवन तहस – नहस हो गया। यात्रा – पर्यटन के ठ्प्प होने से उनका होटल व्यवसाय शिथिल हो गया। सन् 1969 से 1971 तक इसके अलावा अन्य कई जीवनीय घनघोर विप्पत्तियों से घिरे रहे पर वो टूटे नहीं, हिम्मत से काम लिया। फोनिया जी ने पुनः नौकरी करने की दिशा में कदम बढ़ाये। प्रतिभा, हुनर और अनुभव ने उनका साथ दिया। वे अगस्त, 1971 में नवगठित पर्वतीय विकास निगम, उप्र में डिविजनल मैनेजर ( पर्यटन ) और 1973 में जनरल मैनेजर बने। इस दौरान उत्तराखंड में पर्यटन, उद्योग और विपणन के क्षेत्र में उन्होने सराहनीय कार्य किया। उत्तराखंड में पैकेज टूअर्स, शीतकालीन रिर्जाट और क्रीड़ा स्थल, औली रज्जू मार्ग निर्माण, ऋर्षीकेश में वुडवूल फैक्ट्री, तिलवाड़ा रोजिन एवं टरपनटाइन फैक्ट्री, फ्लैश डोर, कोटद्वार, टूरिस्ट रेस्ट हाउस, रिवर राफ्टिंग, चमोली जिले की विद्युत व्यवस्था को राष्ट्रीय ग्रिड से जोडवाना आदि कार्यों में उनकी अग्रणी भूमिका रही थी।उप्र सरकार ने सन् 1976 में पर्वतीय विकास निगम को दो भागों में विभक्त कर गढ़वाल विकास निगम और कुमायूं विकास निगम बना दिया। फोनिया जी इस सरकारी निर्णय से बहुत आहत हुए। बाद के अनुभव साबित करते हैं कि सम्पूर्ण उत्तराखंड के समग्र विकास के दृष्टिगत यह अव्यवाहारिक और घातक निर्णय था। फोनिया जी को यह भी कष्ट हुआ कि वर्ष 1974 में पर्यटन विभाग, भारत सरकार के निदेशक पद को छोड़कर वे पर्वतीय विकास निगम के जरिए उत्तराखंड में अनेकों विकास कार्य-योजनाओं को क्रियान्वित करना चाहते थे। गढ़वाल मंडल विकास निगम में जनरल मैनेजर के रूप में अपनी सेवाये देते हुए फोनिया जी सन् 1979 में भारतीय वाणिज्य निगम में चीफ मार्केटिंग मैनेजर बन कर दिल्ली आ गए। सन् 1982 में वे भारतीय वाणिज्य निगम के जनरल मैनेजर बने और वर्ष 1988 में उन्होने अवकाश ग्रहण किया। उसके बाद सन् 1989 में सीता वर्ल्ड टेवल्स में ‘टूअर लीडर’ के रूप में उन्होने काम करना शुरू किया।फोनिया जी ने वर्ष 1991 में भाजपा से राजनीति में पुनः प्रवेश किया। वे इसी वर्ष उप्र विधान सभा के विधायक और पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री उप्र. सरकार हुए। वर्ष 1992 में यूपी सरकार में पर्यटन मंत्री थे। इस दौरान पहली बार यूपी सरकार ने राममंदिर के लिए 2.77 एकड़ जमीन अधिग्रहित की थी। तब उस फाइल पर बतौर पर्यटन मंत्री फोनिया ने ही हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद सन् 1993 और सन् 1996 में वे लगातार विधानसभा चुनाव जीते। नव – गठित राज्य की अन्तिरिम सरकार में वे पर्यटन और उद्योग मंत्री रहे। वर्ष 2002 का चुनाव वे हारे परन्तु वर्ष 2007 में वे पुनः विधायक निर्वाचित हुए। वर्ष 2012 के चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में वे विधायक चुनाव हार गए। फोनिया जी की लिखीं कई बेहतरीन किताबें उनकी सृजनशीलता को उद्घाटित करती हैं। उनकी किताबों को अकादमिक जगत में सराहा गया है। ‘उत्तराखंड गढ़वाल हिमालय’, ‘उत्तराखंड के धार्मिक एवं पर्यटन स्थल’ (राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार), ‘वैली ऑफ फलावर’, ‘टैवर्लस गाइड टू उत्तराखंड’, ‘उत्तराखंड या उत्तरांचल’, ‘उत्तरांचल राज्य निर्माण का संक्षिप्त इतिहास’ ‘उत्तरांचल से उत्तराखंड के बारह वर्ष’ आदि उनकी महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं। फोनिया जी की आत्मकथा के माध्यम से कई लोकप्रिय व्यक्तित्वों के प्रेरणादाई प्रसंग पहाड़ के लोगों की जीवटता और ईमानदारी को बताते हैं।वास्तव में, केदार सिंह फोनिया जी की जीवन यात्रा एक अध्येता की तरह रही है। जिसमें निरंतर अध्ययन और अपने काम के प्रति समर्पण का स्थाई भाव उनमें हमेशा मौजूद रहा है। उनका कार्य क्षेत्र देश – दुनिया में व्यापकता और विभिन्नता लिए रहा है। विदेशों में लम्बे समय तक कार्य करने और अनेक देशों में अध्ययन यात्राओं यथा- श्रीलंका, मालदीव, कुवैत, जिम्बावे, नेपाल, अफगानिस्तान, वियतनाम, दक्षिण अफ्रिका, मौरीशस, भूटान, फ्रान्स, स्वीजरलैंड आदि के दौरान उनके चिंतन के केन्द्र में उत्तराखंड के पहाड़ और पहाड़वासी ही रहे हैं। इस मायने में उनकी आत्मकथा उत्तराखंड के सीमान्त क्षेत्रों में विकास – यात्रा की भी आत्मकथा है। केदार सिंह फोनिया वर्ष 1992 में यूपी सरकार में पर्यटन मंत्री थे। इस दौरान पहली बार यूपी सरकार ने राममंदिर के लिए 2.77 एकड़ जमीन अधिग्रहित की थी। तब उस फाइल पर बतौर पर्यटन मंत्री फोनिया ने ही हस्ताक्षर किए थे। चीन से लगी देश की लगभग सम्पूर्ण सीमा के सड़क संपर्क से जुड़ने के बाद चीन की बौखलाहट मे इजाफा हुआ है और वह भारत की सीमा पर आए दिन उकसाने की कार्रवाई को अंजाम दे रहा है। बाडाहोती मे भी वह कई बार घुसपैठ कर उकसाने का कुत्सित प्रयास कर चुका है। हालांकि हर बार भारतीय सुरक्षा बलों ने उन्हें खदेड़ा ही है।नीती घाटी के गमशाली गांव के मूल निवासी तथा उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड मे कैबिनेट मंत्री रहे केदार सिंह फोनिया कहते हैं कि वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध से पूर्व चीन ने वर्ष 1959 में ही घुसपैठ कर उकसाने का कार्य शुरू कर दिया था, जो वर्ष 1962 आते-आते युद्ध मे परिवर्तित हुआ। इस बार भी वह कुछ ऐसा ही करता दिख रहा है। विगत वर्षो मे विभिन्न सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठ उसकी उकसाने के साथ ही युद्ध जैसी स्थिति पैदा करने की रणनीति का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि चीन को अब यह भी समझना होगा कि भारत अब 1962 का भारत नहीं है । उत्तराखंड में भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व कैबिनेट मंत्री केदार सिंह फोनिया का आज निधन हो गया। वे लंबे समय से बीमार थे। केदार सिंह फोनिया उत्तराखंड की राजनीति में दो दशक से भी ज्यादा समय तक सक्रिय रहे। वे उत्तराखंड के साथ ही उत्तर प्रदेश में भी कैबिनेट मंत्री रह चुके थे। ।उनकी उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन में भी अहम भूमिका रही है।भगवान दिवंगत आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान एवं शोकाकुल परिवार को यह असीम कष्ट सहने की शक्ति प्रदान करें।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।

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