अमृत महोत्सव पर ‘राष्ट्रीय आंदोलन में उत्तराखंड से उठती लोक अभिव्यक्तियां’ विषय पर गोष्ठी सम्पन्न

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सी एम पपनैं

नोएडा: आजादी के अमृत महोत्सव पर 13 अगस्त की सांय, बुरांश साहित्य एवं कला केन्द्र द्वारा, सेक्टर-34, नोएडा स्थित भारतीय धरोहर पत्रिका परिसर में, समाजसेवी महेश चंद्रा की अध्यक्षता में, ‘राष्ट्रीय आंदोलन में उत्तराखंड से उठती लोक अभिव्यक्तियां’ विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन, प्रवीण शर्मा, सुषमा जुगरान ध्यानी, डाॅ राजेश्वरी कापडी व चारु तिवारी मंचासीनो के सानिध्य में आयोजित की गई।

आजादी के अमृत महोत्सव पर आयोजित गोष्ठी मे, डाॅ सतीश कालेश्वरी, दिनेश कांडपाल, जगमोहन सिंह रावत, सुषमा जुगरान ध्यानी, डाॅ प्रकाश उप्रेती, मंगत राम धस्माना, पीयूष पंत, रमेश कांडपाल, रमेश चंद्र घिल्डियाल, वीना नयाल, डाॅ राजेश्वरी कापडी, पवन कुमार मैथाणी, दीपक ध्यानी, द्वारका प्रसाद चमोली, शशि भूषण खंडूरी, चंद्र मोहन पपनैं तथा चारु तिवारी द्वारा, स्वतंत्रता संग्राम के ऐतिहासिक तथ्यों पर ज्ञानवर्धक विचार व्यक्त किये गए।

प्रबुद्ध वक्ताओ द्वारा व्यक्त किया गया, स्वतंत्रता के महान यज्ञ में प्रत्येक वर्ग ने अपने तरीके से योगदान व बलिदान दिया। साहित्यकार और लेखकों के योगदान को भी नहीं भुलाया जा सकता है। कलमकारों ने बखूबी अपनी भूमिका निभाई। कविताओं की रचना कर देश प्रेम की भावना जगाई और स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया। वक्ताओ द्वारा, गुमानी, गौर्दा, श्रीमन, इत्यादि इत्यादि कवियों के जनमानस को जागृत करने वाली कविताओ का बखान किया गया।

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वक्ताओ द्वारा व्यक्त किया गया, आजादी के राष्ट्रीय परिपेक्ष्य मे, उत्तराखण्ड के स्वतंत्रता सेनानियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। लोक साहित्य मे साहित्य, गीत-संगीत के साथ-साथ, अनेकों सरोकार आते हैं। आंदोलन मे अभिव्यक्तिया सामूहिक रूप से व्यक्त हुई हैं। लोक अभिव्यक्तियों का आजादी के आंदोलन में बड़ा आयाम रहा है।

व्यक्त किया गया, हिमालय चेतना का शक्ति पुंज है। हिमालय का धैर्य विश्व की चीजो को आगे ले जाने की चेतना देता है। जानकारी कोई भी ले सकता है, बोध नहीं हो सकता है। गोरखा शासन के बाद उत्तराखण्ड का जनमानस एक बडे द्वंद से बाहर निकला था। ब्रिटिश हुकुमत का भी, लूट खसोट व शोषण का क्रम बरकरार रहा।

व्यक्त किया गया, हर दशक, रजत जयंती, स्वर्ण जयंती इत्यादि, पुनरमूल्यांकन का मौका देती हैं। हमने क्या खोया, क्या पाया, अवगत होता है। लोकतंत्र को पहचानने की जरूरत है। फुटपाथों मे जो अपना जीवन यापन कर रहे हैं, उनकी बात करनी चाहिए। अंग्रेजो के समय हुए जमीन बन्दोबस्त को देश की आजादी की 75वी वर्षगांठ पर आंकना चाहिए। 1874 मे पहला
जमीन बन्दोबस्त आया था। 1895 मे अंग्रेजो ने वनों पर हमे थोडे अधिकार दिए थे। अमृत काल, 2022 मे क्या हो रहा है? जानना जरूरी है।

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व्यक्त किया गया, उत्तराखण्ड से प्रकाशित अखबार आजादी के आंदोलन में, बहुत बडी अभिव्यक्ति का माध्यम रहे हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र मे बहुत से अखबार प्रकाशित हुए। व्यक्त किया गया, हमारी चेतना का विकास बाहर निकल कर ही हुआ। हमारी अभिव्यक्ति हमारी नहीं, बाहर से ली है। झोड़ा, चांचरी, थडिया, चौफला इत्यादि लोक विधाओ मे आजादी के स्वर मुखर होकर आऐ हैं। पहला झोडा, कालू महर की फांसी पर, उनके आजादी के संघर्ष व बलिदान पर बना था। जल, जंगल, जमीन की पीड़ा मे हमारे लोग तड़फ रहे थे, इसीलिए गांधी जी के साथ लोगो का जुडाव हुआ। कुमांऊ परिषद आजादी का बड़ा संगठन था। 1921 में पहली बार लोक अभिव्यक्ति देखी गई। पहली बार महिलाऐ आगे आई। 1921 उतरैणी-मकरैणी त्यौहार आजादी के आंदोलन में बदला था।

व्यक्त किया गया, 23 अप्रैल 1923 पेशावर विद्रोह के नायक, चंद्रसिंह गढ़वाली को सिर्फ नारों मे नही, बल्कि गूढ़ रूप मे जानने समझने की जरूरत है। राहुल सांकृत्यायन ने उन पर जो लिखा, उसको पढ़ कर, चंद्रसिंह गढ़वाली के कृतित्व व व्यक्तित्व को जाना व समझा जा सकता है।

वक्ताओ द्वारा व्यक्त किया गया, 1930 में सांस्कृतिक विधाए, लोक अभिव्यक्ति के रूप में आगे आई। नाटकों और रंगमंच ने, आजादी के आंदोलन को आगे बढ़ाया। भगत सिंह की फासी पर भी झोडा बना। झोडे में गांधी, नेहरू, सुभाष चन्द्र बोस, श्रीदेव सुमन सबके संघर्ष व बलिदान को याद किया जाता है।

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व्यक्त किया गया, उत्तराखण्ड के परिपेक्ष्य मे लोक अभिव्यक्ति को समझने की जरूरत है।उत्तराखण्ड अकेला राज्य है, जहा गणतंत्र मेला जडाउ खान मे होता है। यह मेला स्वभाविक अभिव्यक्ति है। नागेश सकलानी की शहादत दिवस पर मेला लगता है। आजाद हिंद फौज केसरी चंद पर मेले का आयोजन किया जाता है। वक्ताओ द्वारा व्यक्त किया गया, उत्तराखण्ड के लोक साहित्य को संगृहीत करने की जरूरत है। संस्कृति बोध का होना जरूरी है। लोक अभिव्यक्ति तभी जिंदा रहेगी, जब हम जागरुक रहैंगे।

गोष्ठी अध्यक्षता कर रहे, समाजसेवी महेश चंद्रा द्वारा व्यक्त किया गया, गांधी के साथ जनमानस नहीं जुड़ता तो आजादी का आंदोलन, आंदोलन नहीं होता। व्यक्त किया गया, उत्तराखण्ड की संस्कृति हमारे दैनिक जीवन में छुपी हुई है। अंचल के लोगों के ज्ञान व मानवता के मूल्य बडे हैं। आज जो मंथन किया है, उस पर कार्य करे, देश को आगे बढ़ाऐ। अध्यक्ष के इस वक्तव्य के साथ ही आयोजित गोष्ठी का समापन हुआ। बुरांश साहित्य एवं कला केन्द्र अध्यक्ष प्रदीप वेदवाल द्वारा, आयोजित गोष्ठी का संचालन, बखूबी संचालित किया गया।
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