जीजाजी की साले साहब को‌ सलाह क्रोध और अंहकार का करें त्याग, अच्छे संगठनकर्ता की‌ यही‌ पहचान

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पूर्व सीएम हरीश रावत और पूर्व नेता प्रतिपक्ष प्रीतम सिंह कैंप के बीच जारी कोल्डवार के बीच प्रदेश अध्यक्ष पद पर पदासीन होने के बाद से ही करन माहरा कड़े तेवर दिखाते हुए‌ इशारों में ही वरिष्ठ ‌‌‌‌‌‌‌‌नेताओं को संगठन को कमजोर‌ करने‌‌ वाली बयानबाजी से‌ परहेज करने‌ और पार्टी की मजबूती पर फोकस करने की हिदायत देते आए हैं।ऐसे में कई बार‌ उनके शब्दों में सख्ती भी झलकती रही है।इस बीच पूर्व सीएम हरीश रावत ने उन्हें अपने‌ व्यवहार को संयमित रखने‌ की सीख दे‌ डाली है।

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गौरतलब है की पीसीसी चीफ बनने के बाद‌ करन माहरा सांगठनिक मजबूती के लिए प्रयास करते रहे हैं , गुटबाजी से पार्टी को भविष्य में भी नुकसान की संभावना ‌भांपते हुए‌ वे बार-बार चेताते‌ रहे‌ हैं कि पार्टी को‌ कमजोर करने का प्रयास किसी सूरत में बर्दास्त नहीं किया जाएगा। ऐसे में कई बार उनका लहजा भी सख्त दिखा है।

वरिष्ठ नेताओं के बयानों से क्षुब्ध करन‌ ने कहा था कि “जो लोग अपने बयानों से कांग्रेस को कमजोर कर रहे हैं, उनके चश्मे को तो कोई बदल नहीं सकता।” साथ ही अपने को भगवान मान बैठे नेताओं को आइना‌ दिखाते यह‌ भी कहा था कि “जब कार्यकर्ता किसी नेता से बहुत ज्यादा आहत होता है तो उसे छोड़ देता है। करन ने कहा कि जिस देवता के प्रति लोगों में आस्था नहीं रहती वो देवता भी देवता कहां रह पाता है।” साथ ही बड़े नेताओं को चेतावनी दी थी कि “जो कांग्रेस को इज्जत देगा, पूरी पार्टी उसके साथ चलेगी। लेकिन जो पार्टी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेगा, उसके साथ वैसा ही व्यवहार किया जाएगा।”

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इधर संगठन‌ में अलग-थलग से पड़ते जा‌ रहे पूर्व सीएम‌ हरीश रावत ‌‌‌अपने साले साहब के व्यवहार से नाखुश लग रहे हैं और उन्होंने अपनी नाखुशी सोशल‌ मीडिया ‌‌‌‌‌‌‌के माध्यम से‌ जाहिर भी कर दी है। उन्होंने लिखा है”संगठनकर्ता के लिए आवश्यक है कि वह क्रोध को पूरी तरीके से निगल जाए। अहंकार का संगठन से बैर है। हमें यदि एक अच्छा संगठनकर्ता बनना है तो क्रोध और अहंकार का पूर्णतः तिरस्कार करना पड़ेगा। कुछ घोर विरोधियों से भी सीखना पड़ता है। हमारे राजनीतिक विरोधी ‘श्री और जी’ का भरपूर उपयोग करते हैं। हमें यह सीख लेनी ही पड़ेगी।”

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