सबकी आस्था का केंद्र मां झूला देवी मंदिर, यहां नवरात्र से दशहरे तक विशेष रूप से रहता है श्रद्धालुओं का तांता

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रामेश्वर प्रसाद गोयल

रानीखेत: झूला देवी मंदिर के प्रति क्षेत्र के लोगों की अनन्य आस्था है।यूं तो वर्ष पर्यन्त यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है लेकिन नवरात्र से लेकर दशहरे के दिन तक यहां श्रद्धालुओं की भीड़ रहती‌ है। यह उत्तराखंड राज्य में अल्मोड़ा जिले के चौबटिया गार्डन के निकट रानीखेत से 7 किमी की दूरी पर स्थित है। वर्तमान मंदिर परिसर 1935 में बनाया गया था। मंदिर परिसर के चारों ओर लटकी हुई अनगिनत घंटियां ‘मा झूला देवी’ की दिव्य व दुख खत्म करने वाली शक्तियों को दर्शाती है।

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यह कहा जाता है कि मंदिर लगभग 700 वर्ष पुराना है। चौबटिया जंगली जानवर से भरा घना जंगल था। तेंदुए लोगों पर हमला करते थे और उनके पशुओं को ले जाते थे। लोगों को डर लगा रहता था और खतरनाक जंगली जानवरों से उनकी सुरक्षा के लिए ‘माता दुर्गा’ से प्रार्थना की जाती थी। ऐसा कहा जाता है कि ‘देवी’ एक चरवाहा को सपने में दिखाई दी और चरवाहे से कहा कि वह एक विशेष स्थान खोदे जहां एक मूर्ति पाई जाएगी,देवी उस जगह पर एक मंदिर बनवाना चाहती थी। इसके बाद ग्रामीणों ने उस जगह पर एक मंदिर का निर्माण किया और देवी की मूर्ति स्थापित की। इस तरह ग्रामीणों को जंगली जानवरों द्वारा उत्पीड़न से मुक्त कर दिया गया और चरवाहे आजादी से क्षेत्र के चारों ओर घूमने लगे।

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बच्चे भी आनन्द के साथ वहां झूला झूलने लगे तब ‘मां दुर्गा’ फिर से किसी के सपने में दिखाई दी और खुद के लिए ‘झूला’ लगाने के लिए कहा। वहां के भक्तों ने मंदिर के अंदर एक लकड़ी के झूले में मूर्ति रखी। तब से ‘मां झूला देवी’ और मंदिर को ‘झूला देवी मंदिर’ के रूप में पुकारा जाता है। यह तथ्य बताता है कि इस क्षेत्र में तेंदुओं की उपस्थिति के बावजूद, ग्रामीणों और उनके मवेशी आज भी जंगल में स्वतंत्र रूप से घूमते रहते हैं। लोग मानते हैं कि ‘मां झूला देवी’ अभी भी उन्हें और उनके पशुधन की रक्षा करती है।यहां श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन भी भव्य मेला आयोजित होता है।

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