फिर दलित विमर्श की ओर बढ़ती राजनीति

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देश की राजनीति में दलित विमर्श एक बार फिर केंद्रीय महत्व हासिल करने की ओर बढ़ रहा है. पंजाब में रामदसिया सिख समुदाय से दलित विधायक चरणजीत सिंह चनी को पंजाब का पहला दलित मुख्यमंत्री बनाकर कांग्रेस ने इस बात का संकेत दे दिया है कि वह अपने खोये हुए सामाजिक आधार को वापस पाने के लिये बेक़रार है .

यह दलित बोटो की गोलबंदी की दिशा में कांग्रेस का शंखनाद भी है . इसी कड़ी में पंजाब में दलित मुख्यमंत्री बनाकर वापस लौटे कांग्रेस के महासचिव और पंजाब के प्रभारी हरीश रावत ने हरिद्वार में कह दिया है कि वह उतराखंड राज्य में भी अगला मुख्यमंत्री दलित को ही देखना चाहते हैं . कांग्रेस की यह कोशिश न केवल दलितों के बीच अपनी खोयी ज़मीन वापस पाने की छटपटाहट का सूचक है बल्कि आगामी विधान सभा के चुनावों के लिहाज़ से दलित वोटों के महत्व को भी रेखांकित करता है . ज़ाहिर है कांग्रेस की इस कोशिश से भाजपा ख़ामोश रहने वाली नहीं है . इस दशक में दलितों के बीच अपनी साख बना और बढ़ा चुकी भाजपा भी दलित वोट को किसी भी क़ीमत पर अपनी सोशल इंजीनियरिंग के फ़्रेम से बाहर खिसकने नहीं देना चाहती . सो उसने भी लगे हाथ उत्तराखंड की पूर्व राज्यपाल बेबीरानी मौर्य को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना कर अपनी ओर से दलित गोलबंदी का इरादा ज़ाहिर कर दिया है . देश की राजनीति में उत्तरप्रदेश के महत्व को समझते हुए भाजपा ने बेबीरानी मौर्य को यूपी की चुनाव संचालन की शीर्ष टीम में अन्य जातियों के प्रमुख नेताओं के साथ महत्वपूर्ण स्थान दिया है . भारतीय राजनीति में १९८० का दशक दलित विमर्श का दशक रहा है . इस पूरे दशक में भारत में उत्पीड़ित जातियों और आँचलिक , क्षेत्रीय अस्मिताओं के प्रश्न केंद्र में रहे हैं और ब्यापक संघर्ष के आधार भी बने हैं . इसी दशक में पंजाब के रामदासियाँ सिख समुदाय जो कि दलित सिख समुदाय है , से जुड़े काशीराम ने भारत में दलित अस्मिता का प्रश्न उठा कर भारतीय राजनीति की स्थापित परम्पराओं में भूचाल पैदा कर दिया था . काशीराम के नेतृत्व में ही दलित राजनीति को अपना स्वतंत्र वजूद तलाशने और बनाने का अवशर इसी दशक में मिला . डॉक्टर आम्बेडकर के बाद के भारत में समकालीन दलित विमर्श का पुनर्जागरण भी इसी दशक में देखने को मिलता है . भारत को समझने के लिये यह ज़रूरी है कि इसकी सामाजिक संरचना को सही तरीक़े से समझ लिया जाय और उस इतिहास को भी जिसने समकालीन समाज को गहरे से प्रभावित किया है . १९८० में काशीराम वामसेफ़( बैक्वर्ड एंड मायनारीटीज, शेड्यूलकास्ट एमपलोयी फ़ेडरेशन ) के झंडे के नीचे भारतीय समाज में एक नया दलित विमर्श लेकर सामने आते हैं . १९८१ में वह ds -४ ( दलित समाज शोषित समिति) की स्थापना करते हैं . काशीराम ने अपनी सामाजिक योजनाओं , अपेक्षाओं को इसी मंच से आकार देना शुरू किया और देश भर में समता और सम्मान का आंदोलन शुरू किया . ज़ाहिर है कि इसका दलित वर्गों में गहरा प्रभाव पड़ा और काशीराम दलित सिखसिखअस्मिता के नये प्रतीक बन गये . दलित वर्गों से मिले ब्यापक समर्थन से उत्साहित हो कर काशीराम ने १९८४ में बसपा की स्थापना की . १९८५ में दलित अस्मिता की यह गोलबंदी पंजाब के रामदासियाँ सिख समुदाय से विस्तार पाती हुई यूपी तक पहुँचती है और इसके बढ़ते जनाधार का पता१९८५ में ही यूपी के बिजनौर लोकसभा के उपचुनाव में मिलता है जब बसपा की एक अपरिचित उम्मीदवार मायावती कांग्रेस की उम्मीदवार और बाबू जनजीवन राम की बेटी मीरा कुमार से मात्र पाँच हज़ार बोटो से पीछे रहती हैं . भारतीय राजनीति में१९९० का दशक सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन के संघर्षों का दशक है . इसी दशक में मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू होती हैं. दलित पिछड़ों को शासन, प्रशासन में भागीदारी हासिल होती है. इसी दशक में दलित राष्ट्रपति का मुद्दा भारतीय राजनीति में नये सामाजिक समीकरण बनाता है और डॉक्टर भीमराव आम्बेडकर को भारतरत्न का अलंकरण मिलता है. इसी दशक में दलितों , पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का राजनैतिक ध्रुवीकरण अस्तित्व में आता है . इसी दशक में हम देखते हैं कि पहली बार एक दलित महिला यूपी की मुख्यमंत्री बनती हैं और केंद्र में पिछड़ेवर्ग की सरकार बनती है . इस दशक में इतिहास की इस बड़ी घटना ने भी जन्म लिया कि दलित पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय राष्ट्रीय दलों से छिटककर बाहर निकल आये और अपनी अलग अस्मिता की कहानी लिखने लगे . यह दशक क्षेत्रीय, आँचलिक पहचानों के उभार का भी रहा है . आँचलिक दलों के सहयोग और गठबंधन से केंद्र में सरकार बनना और आँचलिक नेतृत्व का राष्ट्र का नेतृत्व करना , यह सब भी इसी दौर में सम्भव हो सका है . लेकिन इधर दलित और पिछड़ी जातियों की अस्मिताओं के आंदोलन कमज़ोर हुए हैं . मायावती , मुलायम , लालू प्रसाद यादव की अपने समुदायों पर पकड़ कमज़ोर हुई है . यही नहीं आँचलिक अस्मिताओं की अपनी राजनीति भी बहुत कमज़ोर पड़ी है . यह सही है कि इन अस्मिताओं , पहचान के आंदोलनों के कमज़ोर होने का लाभ भाजपा को मिला है और उसका सामाजिक आधार बढ़ा है. यह जानना दिलचस्प होगा कि काशीराम परिघटना से पहले राष्ट्रीय दलों में शामिल दलित नेताओं को वह महत्व कभी नहीं मिल सका जिसके कि वो हक़दार थे . यही कारण रहा कि बसपा , सपा या राजद ने अपनी तरह से अस्मिताओं के प्रश्न उठा कर राष्ट्रीय दलों के सामाजिक तानेबाने को छिन्नभिन्न कर दिया . लेकिन अब परिस्थिति बदलती हुई दिख रही है . भाजपा की अतिकेंद्रीयकृति राजनीति में दलित और पिछड़े ख़ुद को असहज महसूस कर रहे हैं और बाहर निकलने के लिये छटपटा रहे हैं . यही हाल आँचलिक पहचानों का भी है . पर भारत में अस्मिताओं का कोई नया उभार आकार लेगा इसकी सम्भावना तो बहुत कम दिखती है अलबत्ता अपने सामाजिक चिंतन के अनुकूल दलों में अपनी राजनीति के लिये अवसर खोजने और उसमें फ़िट होने की प्रवृति विकसित होती हुई दिख रही है . शायद कांग्रेस पार्टी ने इसी सम्भावना को देखते और समझते हुए पंजाब में काशीराम के समुदाय से दलित मुख्यमंत्री बनाया है और उत्तराखंड में भी दलित मुख्यमंत्री बनाने की इच्छा ज़ाहिर की है .दिनेश तिवारी एडवोकेट पूर्व उपाध्यक्ष विधि आयोग

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