पहाड़ों को दुखों से लड़ने की हिम्मत देने वाले लोक गायक हीरा सिंह राणा

ख़बर शेयर करें -

जन्म दिन आज

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

अनगिनत यादगार नग्में और फोक सांग देने वाले हीरा सिंह राणा का जन्म 16 सितम्बर
1942 को अल्मोड़ा जिले के गांव मानिला डंढोली में उनका जन्म हुआ था। उनकी माता का
नाम नारंगी देवी और पिता का नाम मोहन सिंह था। प्राथमिक शिक्षा मानिला में ग्रहण करने
के बाद वे गीत संगीत की साधना में लीन हो गए लेकिन रोजी रोटी का संकट उन्हें दिल्ली
ले आया। दिल्ली में उन्होंने सेल्समैन की नौकरी की लेकिन लोक संगीत में मं लगाने वाले
हिरदा जल्द में ही संगीत की स्कालरशिप ले कोलकाता चले गए। वहां से लौटने के बाद
उन्होंने 1971 में ज्योली बुरुंश, 1974 में नवयुवक केन्द्र ताड़ीखेत, 1985 में मानिला डांडी,
1992 हिमांगन कला संगम दिल्ली, 1987 में मनख्यू पड्याव जैसे लोक सांस्कृतिक समूहों
का गठन कर लोक संगीत यात्रा का संगम जारी रखा।
अपने जन्मस्थान को याद करता उनका गीत यो मेरी मानिला डांडी तेरी बलाई ल्योंला, तू
भगवती छै तू ई भवानी, हम तेरी बलाई ल्योंला भी खूब लोकप्रिय हुआ। लोक में अपने
पशुओं के प्रति दुलार दर्शाता उनका गीत ‘आ ली ली बाकरी ली ली छु छु’ भी दिलों को छू
जाता है। कुमाऊंनी लोकगीतों के छह केसेट भी उन्होंने निकाले, जिनमे रंगीली बिंदी, रंगदार
मुखड़ी, सौ मनों की चोरा, ढाई बीसी बरस हाई कमाला, आहा रे जमाना जैसे केसेट शामिल
हैं। आकाशवाणी नजीबाबाद, लखनऊ और दिल्ली से भी उनके गीतों का प्रसारण हुआ। उनका
बहुत प्रसिद्ध गीत रंगीली बिंदी, घाघर काई-हाई रे मिजाता भी पहाड़ी समाज में खूब सराहा
गया। महज 15 साल की उम्र से लोकगीतों के रचना साधना में लीं रहे हीरा सिंह राणा को
दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार ने गढ़वाली कुमाऊंनी जौनसारी भाषा अकादमी का
का पहला उपाध्यक्ष बनाकर उनकी प्रतिभा को सम्मान दिया था। हिरदा के नाम से उत्तराखंडी
समाज में लोकप्रिय हीरा सिंह राणा ने अपने समाज के हितों से जुड़े गीतों के लिए खासी
प्रसिद्धि पाई। पहाड़ी रंगमंच में उनका स्थान अलग और विशेष यादगार रहेगा। त्यर पहाड़,

यह भी पढ़ें 👉  रामगढ़ में राजकीय उद्यान विभाग की भूमि उद्योग पतियों को देने का विरोध, स्थानीय निवासियों ने किया बेमियादी धरना आरंभ

म्यर पहाड़, हय दुखों क ड्यर पहाड़। बुजुर्गोंल ज्वड पहाड़, राजनीतिल त्वड पहाड़।
ठ्यकदारोंल फोड़ पहाड़, नान्तिनोंन छोड़ पहाड़।’ जैसे गीत रचकर पहाड़ों की वेदना को उकेरने
वाले हीरा सिंह राणा पहाड़ के हर छोटे-बड़े आंदोलन में भी सक्रिय रहा करते थे। पहाड़ों के
हर सुख-दुःख में साथ रहने वाले हीरा सिंह राणा अपने गीत के जरिए पहाड़वासियों को हर
मुसीबत का सामना बहादुरी के साथ करने का भी हौसला देते रहे।
लस्का कमर बांधा , हिम्मत का साथा ,
फिर भुला उजालि होलि कां ले रोलि राता
लश्का कमर बांधा…..
य नि हूनो, ऊ नि होनो,कै बै के नि हूंनो,
माछी मन म डर नि हुनि चौमासै हिलै के
कै निबडैनि बाता धर बै हाथ म हाथा,
सीर पाणिक वै फुटैली जां मारुलो लातालश्का कमर…..
जब झड़नी पाता डाई हैं छ उदासा,
एक ऋतु बसंत ऐछ़ पतझडा़ का बादा
लश्का कमर बांधा…।’
उनके परम शिष्य लोकगायक और वरिष्ठ पत्रकार डॉ. अजय ढौंडियाल के स्वरों में आज
यूट्यूब पर रिलीज किया गया है। इस गीत के बोल हैं ” हिरदी पीड़ कैले नि जाणि..। हिरदी
पीड़ यानी हृदय की पीड़ा, लेकिन यह किसी एक इंसान के हृदय की पीड़ा नहीं है। यह पहाड़
के हृदय की पीड़ा है, पहाड़ आम जन के हृदय की पीड़ा है। यह पहाड़ की मनोदशा भी है
जिसे पर स्व. राणा जी ने साठ के दशक में अपने शब्दों में उकेरा था। सन साठ के गीत को
आज डॉ. अजय ढौंडियाल ने जनता के समक्ष पेश किया है। इस गीत को खुद स्व. राणा जी
की धर्मपत्नी ने भी सराहा है। यह गीत पहली बार रिकार्ड किया गया है। सबसे बड़ी बात
इस गीत की यह है कि यह गीत पहाड़ के सन्दर्भ में आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना
कि तब था। पहाड़, उसकी पीड़ा, उसकी समस्याएं और उसके सरोकार आज भी वैसे ही हैं जैसे
सन साठ में थे। यह महज एक गीत नहीं है उत्तराखंडी सरोकारों की सशक्त और सुरमय अभिव्यक्ति
है जिसे अब जाकर जनता के समक्ष प्रस्तुत कियाउत्तराखंड की दो मशहूर हस्तियों शहीद केसरी
चंद और मशहूर लोक गायक हीरा सिंह राणा के सम्मान में दिल्ली की पटपड़गंज
विधानसभा में दो सड़कों का नामकरण किया गया. अपनी कविताओं और गीतों के माध्यम

यह भी पढ़ें 👉  जवाहर नवोदय विद्यालय ताड़ीखेत की रक्षिता ने पिरुल पत्ती प्रोजेक्ट के साथ राष्ट्रीय बाल विज्ञान सम्मेलन में प्रतिभाग किया

से कुमाऊँ के सौन्दर्य और संघर्षों की झलक दिखाने वाले और कुमाउँनी, गढ़वाली, जौनसारी
अकादमी दिल्ली के पहले उपाध्यक्ष हीरा सिंह राणा और स्वतंत्रता संग्राम में आजाद हिन्द
फौज के सिपाही के रूप में ब्रिटिश हुकूमत को नाकों चने चबवा देने वाले अमर शहीद वीर
केसरी चन्द्र के सम्मान में वेस्ट विनोद नगर वार्ड में रविवार को दो रोड का नामकरण किया
गया राज्य बनने से पहले भी पहाड़ में यही कहा जाता था कि यहाँ अफसर एक लोहे का सन्दूक ले कर
आता था और तबादले के समय ट्रक भर कर ले जाता था.राज्य बनने के दो दशक होने पर भी तस्वीर
लगभग वैसी ही है कि लुटेरे,तस्कर,भ्रष्ट नेता और नौकरशाह यही कर रहे हैं :अटैच्यूं में भौरो
पहाड़लेकिन इस लूटे के खिलाफ लड़ना ही होगा. संघर्षों के गीतों का शस्त्रागार जो हमारे पास है,उस जखीरे
में राणा जी के गीत उनके दुनिया से विदा होने के बाद भी हमारे साथ बने रहेंगे. और राणा जी तो आस
जगाते हैं :.हिरदा लोकसंस्कृति के मजबूत हस्ताक्षर थे, देवभूमि उत्तराखंड के सौंदर्य को अपने गीतों में जिस
खूबसूरती से उन्होंने पिरोया, ऐसा शायद ही कोई और कर पाए। भावपूर्ण श्रद्धाजंलि हिरदा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *