…ग्लोब सिनेमा में रोजाना चार शोऽऽ. हमारी यादों का सिनेमा हाॅल.

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‘वो कहानी थी चलती रही
मैं किस्सा था यूं ही खत्म हुआ`
शायद खंडहर होते इस भवन का एक -एक पत्थर सालों से यही कहता रहा है।लेकिन आज जरूर इन्हें सुकून मिला होगा कि बहाने ‘पद्मावत ‘फिल्म किसी ने तो इसके खत्म हो चुके किस्से को पुनः रौशनाई देने की कोशिश की। जी हां,बात हो रही है रानीखेत के ग्लोब थियेटर की जिसकी चमक अब अतीत की स्याह गर्त में समा चुकी है।इस सिनेमा हाल के रूपहले पर्दे पर हजारों कहानियाँ चलीं, और एक दिन कहानियाँ दिखाते -दिखाते ग्लोब थियेटर हमेशा के लिये किस्सा बन गया।रानीखेत की हमसे पहले की पीढ़ी और हमारे वय के रहवासियों ने कोई न कोई फिल्म यहाँ अवश्य देखी होगी।सेना क्षेत्र से लगे सुरम्य ,शांत वातावरण में अवस्थित इस थियेटर का आकर्षण तब बरबस अपनी ओर खींचता था विशेषकर युवा पीढ़ी को ।बाजार में किसी नई फिल्म के पोस्टर चिपकने के साथ ही हाथ में टीन का बना बेतार ‘चैंलेजर’ लेकर जब हर चौराहे पर झब्बा लाल उदघोषक की भारी आवाज गूंजती-‘गलोब सनीमा में ,रोजाना चार सो,दिन में बारा बजे..साम को तीन …छह बजे….नौ बजे……फिलम में हेमा मालनी ,राजेश खन्ना ने बेतरीन काम किया है..। तो उनके इर्द गिर्द मासूम बचपन घेरा डाल कर खड़ा हो जाता।झब्बा लाल का एनाउंस करने का अलग ही अंदाज था, वह अंतिम ‘है’शब्द को जोर देकर कहते थे,ये एनाउंस का अंदाज कहें या उनके हाथ में रहने वाले फिल्मी पोस्टर कट आउट को देखने की ललक हम बच्चे उन्हें चौराहे पर घेर कर खड़े हो जाते ,लोग भी घरों के बरामदों में निकल कर उन्हें सुनते। बाद के दिनों में झब्बा लाल के पड़ोसी छुन्नू लाल नए उदघोषक के रूप में सामने आए।छुन्नू लाल की आवाज में गरज तो नहीं थी लेकिन पतली तीखी आवाज में भी गज़ब का आकर्षण था। बस्स..इधर फिल्म बदली नहीं कि मन में फिल्म के मुख्य दृश्य देखने की जिज्ञासा खदबद करने लगती ।क्योंकि फिल्म देखना उन दिनों घर से इजाजत के बिना सम्भव नहीं होता था और इजाजत होती भी तो अभिभावकों के साथ ही ।इसलिये जब खेलने आल्मा ग्राउंड (आज का नरसिंह मैदान)जाते तो वहां से चंद फलांग पर स्थित ग्लोब थियेटर की ओर दौड़ पड़ते केवल मुख्य दृश्य देखने की लालसा में ,तब चल रही फिल्म और आने वाली फिल्म के मुख्य दृश्य थियेटर के बरामदे की दीवारों से लगी जालीदार अल्मारीनुमा कोठकों में फोटो रूप में सजाये जाते थे।बड़ा आकर्षण था इन्हें देखने का,एक तरह से पूरी फिल्म देखने की तृप्ति सा।क्योंकि हर फिल्म देख पाना उन दिनों बड़ा मुश्किल होता था।जालियों के भीतर कैद इन दृश्यों को देखते वक्त एक अज्ञात सा भय भी भीतर में तैरता रहता कि कहीं पडो़स का कोई घरेलू परिचित देख न ले,और घर पर शिकायत न कर दे। क्योंकि उन दिनों रिश्तों का साझापन बहुत गहरा था ।बच्चों की घर में होने वाली हर दूसरी शिकायत पड़ोस के किसी चाचा,ताऊ ,बूबू की ओर से ही होती थी।आशय यह कि उन दिनों दूसरे के बच्चों का ख्याल भी बड़े-बुजुर्ग अपनेपन से रखते थे।एक तरह से कहा जाय तो मुहल्ले के चाचा ,ताऊ बूबू ,दद्दा ,उस समय के सीसी टीवी कैमरे हुआ करते थे,जिन से बच पाना आसान नहीं होता था ।क्योंकि तबका रानीखेत सीमित आबादी का छोटा सा शांत कस्बा था ,जहाँ बाजार में निकल जाओ तो एक ही व्यक्ति बिना तलाशे आपको चार बार टकरा जाता था ,ऐसा कस्बा कि हर नजर एक दूसरे को छह बार तो सलाम करती ही होगी ।हालाँकि उन दिनों आँखों से अदब व सलामी का रिवाज नहीं था।हाथ जोड़कर,ठहर कर एक दूसरे की मिज़ाजपुर्सी होती थी। खैर..
बात हो रही थी ग्लोब थियेटर की।आज अपनी बे-नूरी पर आँसू बहाता यह थियेटर उस दौर में काफी गुलजार रहता।इस ठंडे हिल स्टेशन में भी थियेटर में रात्रिकालीन शो चलते वह भी पूरी रौनक ओढ़कर ।दिन की तो बात ही कुछ और होती ।एक शो भीतर चल रहा होता तो दूसरे शो के टिकटार्थी भीतर घुसने की बारी का इंतजार थियेटर के लान में हरी मखमली घास में धूप में बैठ कर किया करते।कोई लोकप्रिय फिल्म थियेटर तक पहुँच जाती तो थियेटर के बाहर भीड़ की दृष्टि से उत्सव का सा माहौल बन जाता।मुझे याद है ‘जय संतोषी माँ’फिल्म ने भी इस थियेटर में काफी धूम मचाई थी।इस फिल्म को देखने के लिये दूरदराज के गांवों से भी बड़ी तादात में लोग उमड़ पड़े थे। शायद यह फिल्मी शौक से अधिक आस्था का सवाल जान पड़ता था।यह फिल्म लम्बे वक्त तक इस थियेटर के पर्दे पर टिकी और जब तक थियेटर के भीतर रही बाहर माता के जागरण जैसी भीड़ रही।इस फिल्म की रील ने ही नहीं ,पर्दे ने भी पैसा कमा कर दिया.क्योंकि मां की आस्था से बंधे दर्शक पर्दे की ओर न केवल प्रणाम की मुद्रा में झुकते अपितु पैसा भी चढ़ाते।बाद-बाद में थियेटर के भीतर गुड़ चने का प्रसाद भी बंटने लगा था। कहने का मतलब यह है कि थियेटर का यह वीरानी में घुल चुका भवन इस बात का गवाह भी रहा कि आस्था कितनी बलवान होती है,और इसने खुद को मंदिर बनते भी देखा है। बाँबी,दीवार , कौन सी ऐसी फिल्म न होगी जिसने यहाँ रिकार्ड तोड़ शो न दिये हों!हम अकसर आगे की सीट पर बैठ कर फिल्म देखते ,शायद दो -तीन रूपये का टिकट था आगे सीट का। थियेटर में सीटें लकड़ी की थीं और हां ,बालकनी जैसी सुविधा भी नहीं थी ।बालकनी कहें तो रील चलाने वाले कंट्रोल रूम के आजू-बाजू से दो लकड़ी के केबिन बने थे जिसकी सीढ़ियाँ थियेटर के बाहर से थीं।यहाँ कौन बैठ कर फिल्म देखता होगा ?यह जिज्ञासा कुलबुलाती रहती ,मन भी होता कभी ऊपर बैठ कर फिल्म देखकर इतराने का,मगर ये ख्वाहिश कभी पूरी नहीं हुई। और जब ख्वाहिश पूरी करने के दिन आये तो ये थियेटर ख्वाब बन गया।और भी बहुत सी यादें हैं इस थियेटर से जुड़ी…।सच तो यह है कि चिर यादों का यह सिनेमा घर अब भूला दिया गया है शहर से हट कर होने के कारण भी हर रोज इसका दीदार नहीं हो पाता, बारास्ते दीदार इसकी यादें जरूर संचित- सिंचित होती।आज हंगामाख़ेज पद्मावत फिल्म को लेकर जैसा कोहराम मचा है उसके झटके से ही कहें ,कभी अपने चलचित्रण से हमारे मन मस्तिष्क का रंजन करने वाले ग्लोब थियेटर का चलचित्र मस्तिष्क की मशीन में रील की तरह चल पड़ा और कानों में घुलने लगी झब्बा लाल की गरज के साथ हवा में गूंजती आवाज-“गलोब सनीमा में…रोजाना चार सो…।
#विमल सती प्रकृत लोक

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अब सिर्फ यादों में शेष ग्लोब थियेटर रानीखेत
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