भूस्खलन :यहां मोड़-मोड़ पर होता है कोई न कोई हादसा

ख़बर शेयर करें -


डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पहाड़ी राज्यों में कमजोर पहाड़ों से होने वाला भूस्खलन बड़ी दुश्वारी और चुनौती का सबब बना हुआ है। सबसे बड़ी बात यह है कि भूस्खलन से निजात पाने के तमाम दावे हवा-हवाई साबित हो रहे हैं। आलम यह है कि ऑलवेदर रोड भी अपने नाम को सार्थक नहीं कर पा रही है।ऑलवेदर रोड हर मौसम में भूस्खलन की वजह से आए दिन बाधित हो रही है। इससे इसकी गुणवत्ता पर भी सवाल उठने लगे हैं। सरकारी तंत्र भूस्खलन को लेकर संवेदनशील नहीं है। न सभी आशंकित जोनों की निगरानी हो रही और न ही किसी प्रकार का चेतावनी सिस्टम ही लगाया गया है।प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन जोन बढ़ते ही जा रहे हैं। इनसे, खासतौर पर मानसून के दिनों में यात्रा करना खतरे से खाली नहीं है। कब किस सड़क पर पहाड़ से गिरकर मलबा और बोल्डर आ जाए, कहा नहीं जा सकता है। प्रदेश में इस समय करीब 84 डेंजर जोन (भूस्खलन क्षेत्र) सक्रिय हैं। देश, दुनिया में बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में से एक भूस्खलन से जहां हर साल हजारों इंसानों को अपनी जिंदगी बचानी पड़ती है। वहीं अरबों की संपत्ति का नुकसान होता है। उत्तराखंड में सरकार और शासन इसके प्रति गंभीर नजर नहीं आते। वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलॉजी जैसे वैज्ञानिक संस्थानों को भी भूस्खलन के कारणों के विस्तृत अध्ययन करने व रोकने को लेकर ठोस उपायों की सिफारिश देने के लिए नहीं लगाया गया है।सरकार और तमाम वैज्ञानिक संस्थान कितने संवेदनशील हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पूरे उत्तराखंड में भूस्खलन पर निगरानी को लेकर कहीं भी अर्ली वार्निंग सिस्टम नहीं लगाए गए हैं। वाडिया इंस्टीट्यूट की ओर से आपदा के लिहाज से संवेदनशील कुछ ग्लेशियरों की निगरानी को लेकर ही अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाए गए हैं। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश समेत देश के हिमालयी राज्यों में भूस्खलन को लेकर समय-समय पर अध्ययन किए जा रहे हैं। हाल ही में वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने उत्तराखंड के नैनीताल और मसूरी जैसे इलाकों में भूस्खलन को लेकर विस्तृत अध्ययन किया है और जिसकी रिपोर्ट भी सरकार शासन को सौंपी गई। लेकिन ऐसी प्राकृतिक आपदाओं को लेकर अभी कुछ किया जाना बाकी है वैज्ञानिकों के मुताबिक हिमालयी क्षेत्रों में होने वाली बर्फबारी के बाद जब गर्मी में बर्फ पिघलती है तो चट्टानों और मिट्टी को मुलायम बना देती है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ढलानों पर गुरुत्वाकर्षण बल अधिक होने की वजह से चट्टानें और मिट्टी नीचे खिसकने लगती हैं। यही भूस्खलन का कारण बनतीं हैं।
इतना ही नहीं जलवायु परिवर्तन के चलते उत्तराखंड समेत देश के तमाम पर्वतीय राज्यों में कम समय में बहुत अधिक बारिश भी भूस्खलन का कारण बन रही है। वैज्ञानिकों की बातों पर यकीन करें तो उत्तराखंड समेत देश के तमाम हिमालयी राज्यों में अंधाधुंध तरीके से सड़कों के निर्माण समेत तमाम विकास कार्य, वनों की कटाई और जलाशयों से पानी का रिसाव भूस्खलन का बड़ा कारण साबित हो रहा है। उत्तराखंड समेत दुनिया में भूस्खलन की जितनी भी बड़ी घटनाएं हुईं, उनमें से ज्यादातर में भूस्खलन की गति 260 फीट प्रति सेकंड के आसपास रही। वैज्ञानिकों की मानें तो गुरुत्वाकर्षण बल अधिक होने के कारण भूस्खलन के दौरान मलबा तेजी से नीचे गिरता है और भारी तबाही होती है। देश में कुल जमीन में से 12 फ़ीसदी जमीन ऐसी है जो भूस्खलन के लिहाज से संवेदनशील है। भूस्खलन के लिहाज से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के अलावा देश के पश्चिमी घाट में नीलगिरि की पहाड़ियां, कोंकण क्षेत्र में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और गोवा, आंध्र प्रदेश का पूर्वी क्षेत्र, पूर्वी हिमालय क्षेत्रों में दार्जिलिंग, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश, पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर और उत्तराखंड के कई इलाके भूस्खलन के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं। उत्तराखंड में अब बारिश अपना रौद्र रूप दिखाने लगी है। पहाड़ से लेकर मैदान तक जोरदार बारिश हो रही है। पर्वतीय जिलों में भूस्खलन से सड़कें बंद हो रही हैं। वहीं, मैदानी इलाकों में सड़कें जलमग्न हो रही हैं। मौसम विभाग ने आज से तीन दिन के लिए भारी बारिश का ओरेंज अलर्ट जारी किया गया है। साथ ही आगामी एक सप्ताह तक भारी बारिश का अनुमान है। लगातार बारिश के चलते तापमान में गिरावट दर्ज की जा रही है। ऐसे में लोगों को गर्मी से राहत जरूर है। मौसम विभाग ने पर्वतीय इलाकों में भूस्खलन की संभावना जताई है। वहीं, नदी- नालों का जल प्रवाह बढ़ने की आशंका के मद्देनजर तटवर्ती इलाकों में लोगों को सचेत रहने को कहा गया है। साथ ही लोगों को सलाह दी गई है. लगातार बारिश होने से पहाड़ी क्षेत्रों में कई स्थानों पर भूस्खलन हुआ जिसके फलस्वरूप बदरीनाथ और केदारनाथ जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों समेत 250 से अधिक सड़कें बाधित हो गयीं। वर्षा एवं भूस्खलन का जिन मार्गों पर असर पड़ा है उनमें 11 राज्य राजमार्ग एवं 239 ग्रामीण सड़कें हैं। उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्र में अधिकांश नगरों गांवों के हालात इस समय इसी तरह के हैं, मौसम के बदलाव ने भूस्खलन भूधंसाव की घटनाओं में बढ़ोत्तरी ही की है जिससे पहले ही पलायन से खाली हुए नगर गांव आपदा की मार से और वीरान हो रहे हैं। इनके बचाने के लिए बहुत व्यापक तौर पर एकीकृत वैज्ञानिक अध्ययनों की व चिंतन की जरूरत है। इसके अभाव में हम हिमालय की आबादी के साथ ही हिमालय को भी खो देंगे। भूस्खलन से होने वाले नुकसान को कम से कम करने के उपाय तलाशने की ज़िम्मेदारी है। इस क्रम में मोटे तौर पर दो उपाय किए जाएंगे। पहला है लंबी और गहरी जड़ वाले पेड़ लगाया जाना और दूसरा सेंसर लगाना की ज़िम्मेदारी है
लेखक के निजी विचार हैं वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरतहैं।

लेखक
Ad
Ad

Leave a Reply

Your email address will not be published.