भू-धंसाव से उत्पन्न स्थिति से शासन ने सबक सीखना चाहिए

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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
शंकराचार्य की तपोस्थली ज्योतिर्मठ। सीमांत जनपद चमोली का सरहदी ब्लॅक। विश्व प्रसिद्ध हिम क्रीडा स्थल औली, आस्था का सर्वोच्च धाम बद्रीनाथ, हेमकुंड साहिब और रंग बदलने वाली फूलों की घाटी का प्रवेश द्वार में ही हूं। देश की द्वितीय रक्षा पंक्ति नीती माणा घाटी मेरे ही नगर से होकर जाया जाता है। हर साल देश विदेश से लाखों-लाख तीर्थयात्री और पर्यटक यहां पहुंचते है। चिपको आंदोलन की नेत्री गौरा देवी की थाती हूं। पंच प्रयाग में से प्रथम प्रयाग मेरे ही मुहाने पर धौली गंगा और अलकनंदा का संगम विष्णुप्रयाग अव्यवस्थित है। वर्ष 1970 की धौली गंगा में आई बाढ़ ने पाताल गंगा, हेलंग से लेकर ढाक नाला तक के बडे भू-भाग क्षेत्र को हिलाकर रख दिया था, जिसके बाद 2013 की केदारनाथ आपदा और फरवरी 2021 की रैणी आपदा नें तपोवन से लेकर विष्णुप्रयाग के संगम को बहुत नुकसान पहुंचाया है, नदी किनारे कटाव बढने से भी भूस्खलन को बढ़ावा मिला है, शहर के नीचे से होकर एनटीपीसी की तपोवन विष्णुगाड़ परियोजना की सुरंग निर्माणाधीन है, जो भू-धसाव के लिए सबसे बडा कारण माना जा रहा है। पूर्व के बरसों में हेलंग से लेकर पैनी गांव, सेलंग गांव में भू-धसाव की घटना सामने आ चुकी है। भू-धसाव से मेरे शहर के गांधी नगर, मारवाड़ी, लोअर बाजार नृसिंह मंदिर, सिंहधार में, मनोहर बाग, अपर बाजार डाडों, सुनील, परसारी, रविग्राम, जेपी कॉलोनी, विष्णुप्रयाग, क्षेत्र अधिक प्रभावित हैं।सामरिक महत्व के बदरीनाथ हाईवे जोशीमठ के भी भूधंसाव की चपेट में आने के कारण खतरा बढ़ चुका है। राजमार्ग पर जगह जगह आईं बड़ी-बड़ी दरारें चिंता का कारण बन गई हैं। यदि दरारें थोड़ा भी और चौड़ी हुई तो हाईवे का एक बड़ा हिस्सा कभी भी जमींदोज हो सकता है। ऐसे हालात में भारतीय सेना चीन की सीमा से कट सकती है। सीमांत जिले चमोली के जोशीमठ से बदरीनाथ की दूरी करीब 46 किमी है। जोशीमठ के घटनाक्रम से सीख लेते हुए भूधंसाव की व्यापक स्तर पर उच्च स्तरीय जांच करे। क्या यह भूधंसाव एनटीपीसी की सुरंग के बनने से हुआ है बदरीनाथ से आगे का रास्ता चीन सीमा की ओर जाता है। जोशीमठ प्रमुख हिंदू और सिख धार्मिक स्थलों जैसे बद्रीनाथ और हेमकुंड साहिब का प्रवेश द्वार है। यह चीन के साथ भारत की सीमा के पास प्रमुख सैन्य ठिकानों में से एक है।शहर के जिन सैकड़ों घरों में दरारें आ गई हैं, उन घरों से पानी की धार भी फूटने लगी है, जिस वजह से हजारों लोग पलायन को मजबूर हो गए हैं। शुरू में लोगों के आवाज उठाने के बाद भी सरकार ने इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया, लेकिन अब हालात बेकाबू होने के बाद शहर में स्थित एशिया की सबसे लंबी जोशीमठ-औली रोपवे सेवा के टॉवर नंबर 1 की जमीन धंसने के कारण रोपवे को पर्यटकों के लिए बंद करवाकर सरकार ने पास में स्थित एनटीपीसी की एक परियोजना को बंद कर दिया है। राजमार्ग के हालात देखकर वे चिंतित हैं और उनके चेहरों पर पसरी चिंता साफ बता रही कि स्थिति सामान्य नहीं है। ये सब क्यों हो रहा है, इसका जवाब अभी उनके पास नहीं हैं। कोई भी यह बताने को तैयार नहीं है कि आखिर यह कैसे हो रहा है? क्या आल वैदर रोड की कटिंग इसका कारण हो सकता है या फिर जोशीमठ में बिना प्लानिंग के बने बड़े-बड़े होटल भी इसकी एक वजह हो सकती है। इस चुनौती से निपटने के लिए सरकार को तीन स्तर पर न केवल व्यापक रूप से कार्य करना होगा, बल्कि जोशीमठ से सबक लेते हुए उत्तराखंड के विकास का मॉडल भी तैयार करना होगा।
पर्यावरणविद् भट्ट ने बताया कि मिश्रा कमेटी ने तत्कालीन सरकार को सौंपी रिपोर्ट में जोशीमठ में वर्षा और घरों से निकलने वाले पानी की निकासी के उचित प्रबंध करने, अलकनंदा नदी से होने वाले कटाव की रोकथाम के लिए बाढ़ सुरक्षा को कदम उठाने, निर्माण कार्यों को नियंत्रित करने जैसे सुझाव दिए थे।साथ ही सिंचाई, लोनिवि समेत अन्य विभागों के लिए गाइडलाइन तय की थी।उन्होंने बताया कि तब पानी की निकासी के दो-चार नाले अवश्य बने, लेकिन इसके बाद कोई कदम नहीं उठाए गए।जोशीमठ के प्रति इस तरह की अनदेखी अब भारी पड़ रही है। इस परिदृश्य के बीच बड़ा प्रश्न यह भी तैर रहा है कि जिस तरह की सक्रियता तंत्र अब दिखा रहा है, यदि इसे लेकर वह वर्ष 1976 में ही जाग जाता तो आज ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होती। दरअसल, अविभाजित उत्तर प्रदेश के दौर में अलकनंदा नदी की बाढ़ ने जोशीमठ समेत अन्य स्थानों पर तबाही मचाई थी। तब कई घरों में दरारें भी पड़ी थीं। प्रदेश में जोशीमठ जैसे संवेदनशील स्थल कई जिलों में हैं। जोशीमठ के अलावा अल्मोड़ा और नैनीताल के संबंध में पूर्व में विशेषज्ञ कमेटियों ने पड़ताल कर रिपोर्ट शासन को सौंपी थी। यही नहीं, उत्तरकाशी जिले में वरुणावत पर्वत ट्रीटमेंट का विषय किसी से छिपा नहीं है। सरकारों की अदूरदर्शिता और अनियोजित विकास कार्यों ने सनातन धर्म के शिखर स्थलों सहित पौराणिक नगरी जोशीमठ (ज्योर्तिमठ) के लाखों नागरिकों के भविष्य को खतरे में डाल दिया है। उन्होंने कहा कि पिछले एक वर्ष से लगातार क्षेत्र में जमीन धंसने की शिकायतें मिल रही थी, लेकिन उन पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया। नतीजा सबके सामने है।सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती ऐतिहासिक शहरवासियों को बचाने की है। सरकार को विस्थापन की महत्वकांक्षी योजना पर गंभीरता से कार्य करना चाहिए। लेखक दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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