वैश्विक पटल पर उत्तराखण्ड मूल के सु-विख्यात जादूगर के अद्भुत चमत्कार,आप भी जानिए,कुतुबमीनार को गायब करने वाले जादूगर के बारे में

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सी एम पपनैं

नई दिल्ली। जादू कला भारत की पारंपरिक सांस्कृतिक विरासतों में से एक है। हमारे देश मे प्राचीन काल से अभी तक हजारों जादूगर हुए हैं। जो समय व्यतीत होते इतिहास के गर्त में खो गए। देश मे स्थापित सरकारों की उदासीनता के परिणाम स्वरूप आज हमारे देश में गिने-चुने जादूगर रह गए हैं। इन्ही जादूगरों में उत्तराखंड मूल के जादूगर डाॅ के सी पांडे 1980 से 2010 तीन दशकों तक वैश्विक पटल पर अपार ख्याति अर्जित करते रहे हैं। वर्तमान में यह ख्याति प्राप्त सिद्धहस्त जादूगर इस विधा को विज्ञान व गणित विषयों से जोड़कर शिक्षा व स्वास्थ के क्षेत्र में एक अनुपम अद्भुत व प्रभावशाली कार्य को अंजाम के शिखर तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि प्रदर्शित किए गए जादू कला के अद्भुत चमत्कारों के बल पर भारतीय जादूगरों को वैश्विक पटल पर ख्याति मिली है और इन जादूगरों ने न सिर्फ स्वयं का बल्कि अपने देश का नाम भी रोशन किया है। वैश्विक पटल पर नामचीन जादूगरों द्वारा दिखाए गए चमत्कारों में न्यूयार्क हार्बर मे स्थित ‘स्टैच्यू आफ लिबर्टी’, कोलकता के ‘विक्टोरिया मैमोरियल’ व ‘चलती ट्रेन’ व आगरा स्थित ‘ताजमहल’ को गायब करने के चमत्कार दिखा कर लोगों को हतप्रभ किया गया, तो किसी जादूगर ने हवा में कालीन व लड़कियों को उड़ाने का तो किसी ने बड़े-बड़े जानवरों को गायब कर अपार ख्याति अर्जित की।

दिल्ली स्थित ‘कुतुब मीनार’ को, 2003 में गायब कर वैश्विक पटल पर ख्याति अर्जित करने वाले व समय-समय पर देश-विदेश मे जादू के अद्भुत व करिश्माई चमत्कार दिखाकर देश का नाम रोशन करने वाले जादूगर डाॅ के सी पांडे उत्तराखण्ड के मूल निवासी हैं और वर्तमान में पूर्वी दिल्ली मे निवासरत हैं। विस्तृत अवलोकन कर ज्ञात होता है वैश्विक फलक पर ख्याति प्राप्त उत्तराखण्ड का यह जादूगर जिसके परिजनों का जादूगरी से दूर-दूर तक सम्बंध नही रहा, जादू कला की विधा मे देश के एक मात्र ‘डाॅक्टर आॅफ फिलासफी’ डिग्री धारक जादूगर है, जिसने सात वर्ष की उम्र से ही जादू कला में ख्याति अर्जित करनी आरंभ कर दी थी। विश्व विख्यात इस जादूगर की जीवन गाथा शैक्षिक व सामाजिक सरोकारों से जुड़ी सोच प्रेरणादायी है।

उत्तराखंड, बागेश्वर (गरूड़) के नजदीक गांव स्यालटीट के मूल निवासी स्व.बालादत्त पांडे के पुत्र हैं डाॅ के सी पांडे। जिनका जन्म 1962 दिल्ली में तथा पढ़ाई-लिखाई दिल्ली प्रवास मे ही सम्पन्न हुई है। छ: वर्ष की बाल उम्र में दिल्ली गांधीनगर की गली में एक जादूगर का अद्भुत करिश्मा तथा घर के मकान में किराए पर रह रहे उत्तराखंड पहाड़ी अंचल की एक महिला में देवी अवतरण व एक अन्य व्यक्ति द्वारा नाचते व हल्ला-गुल्ला करते, एक के बाद एक घी मे जलती बत्तियों को निगलता व उस नाच रही महिला को शांत होता देख बालक के सी पांडे आश्चर्य चकित हुए बिना नही रह सके थे। प्रो.के एन शर्मा (कानपुर) वाले भी पांडे जी के किरायेदार थे उन्होंने भी वह घी मे जलती बत्ती निगलने वाला दृश्य देखा था।

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प्रो.के एन शर्मा स्वयं दिल्ली के एक नामी जादूगर थे। जादू का खेल दिखाना ही उनका व्यवसाय था। बालक के सी पांडे की चाहत पर उन्होंने बालक की शंका दूर करने की ठानी। बालक से बर्फ़ी मिठाई मंगवाई उसे वह बर्फ़ी खिलाई। बालक को उसका स्वाद नमकीन लगा। बालक ने कारण जानना चाहा। प्रो. शर्मा ने बताया, यही जादू है। बालक की इच्छा, जादू विधा पर रमते व इस कला को सीखने की चाहत देख प्रो.शर्मा ने बालक के सी पांडे से कहा, तुमने बर्फ़ी में नमक चख लिया है, अब कभी भी नमक हरामी नहीं करोगे। जो विधा सिखाई जायेगी, उससे किसी का अहित व सिखाई गई कला का दुरूपयोग नहीं करोगे। बालक द्वारा विश्वास दिलाने जाने के बाद प्रो.शर्मा द्वारा बालक को सबसे पहले जलती हुई घी की बत्तियां निगलने का चमत्कार करके दिखाया गया। फिर बालक को यह कारनामा कैसे किया बताया व बालक से उस चमत्कार को स्वयं करने को कहा। बालक ने जैसे-तैसे उस चमत्कार को अंजाम दिया।

जादू कला के कई कारनामे प्रो.शर्मा से सीख सात वर्ष की उम्र में, माता-पिता की अनुमति व सहयोग से पहली बार कृष्णा नगर के एक स्कूल में हौसले के साथ जादू का चमत्कार दिखा, सीखी कला की विधा मे के सी पांडे द्वारा प्रभावशाली पदार्पण किया गया। जीवन मे फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। जिस भी स्कूल में पढ़ा, उस स्कूल का नाम रोशन किया। जादू दिखाने पर विभिन्न स्कूलों व अन्य आयोजकों से चार-पांच सौ रुपयों की प्राप्ति भी होने लगी थी। ‘धनपत मल विरमानी स्कूल’ रूपनगर, 11 वी व 12वी, 1978-79 में पढ़ने के दौरान, स्कूल प्रधानाचार्य एन एस सेठी द्वारा, स्कूल का नाम रोशन करने हेतु, लगभग सभी स्कूल सम्बंधी सुविधाऐं, बाल जादूगर के सी पांडे को मुहैया कराई जाने लगी थी। स्वयं के जेब खर्च चलने के साथ-साथ, इस बाल जादूगर के स्कूली समकक्ष सखाओं की भी, खाने-पीने व मौज-मस्ती के मामले में, पौ-बारह होने लगी थी। जादू कला मे ख्याति अर्जित करने के साथ साथ, पढाई-लिखाई मे भी के सी पांडे सदैव अव्वल रहे। पोस्ट ग्रेजुएशन में गोल्ड मैडलिस्ट रहे।

शिक्षा पूर्ण होते ही डाॅ के सी पांडे को प्राईवेट, सरकारी व विदेशी कार्यक्रम आयोजक एजेंसियों द्वारा, व्यवसायिक तौर पर जादू शो दिखाने के लिए सम्पर्क किया जाने लगा। डाॅ के सी पांडे द्वारा जादू कला विस्तार की दृष्टि से सहायकों की एक टीम का गठन किया गया। देश-विदेश की ख्याति प्राप्त हस्तियों के मध्य, अपनी नायाब जादू कला का चमत्कार दिखा, वैश्विक फलक पर पहचान बनाने मे कामयाब होने लगे। 1986 दिल्ली मे राष्ट्रीय फलक पर आयोजित ‘अपना उत्सव’ के अतिरिक्त, दिल्ली प्रगति मैदान मे, प्रतिवर्ष शो आयोजित होने लगे। दुबई 1998 में, एक माह तक आयोजित ‘इंडिया फेयर’ मे, वालीवुड के नामचीन फिल्मी कलाकारो व गायको के साथ प्रतिदिन, जादू शो आयोजित किए। 1995 दिल्ली में, पुराना सचिवालय से राजघाट तक, आंखों में पट्टी बांध कर, ट्रैफ़िक नियमो का पालन करते हुए, मोटर साइकिल यात्रा आदि-आदि दर्जनों चमत्कारों ने, डाॅ के सी पांडे को जादूगरो की पहली पांत की ओर बढ़ने को अग्रसर कर दिया था। 1995-96 दिल्ली में, स्थापित, ‘मैजिक अकादमी आफ इंडिया ट्रस्ट’ के डाॅ के सी पांडे संस्थापक सदस्य बने।

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2003 मे, दिल्ली स्थित कुतुब मीनार को कुछ क्षण के लिए गायब करने का चमत्कार दिखाने पर, डाॅ के सी पांडे का नाम ‘लिम्का बुक ऑफ रिकार्डस’ मे शामिल किया गया तथा बाद के वर्षों में ‘इंडियन बुक ऑफ रिकार्ड’ तथा 2016 में ‘गिनिज वर्ल्ड रिकॉर्डस’ मे भी नाम दर्ज हुआ।

जादू कला के अद्भुत चमत्कारों के बल, देश के लगभग राज्यो के साथ-साथ, जापान, जर्मनी, आस्ट्रिया, फ्रांश, लंदन, स्वीटजरलैंड, दुबई, नेपाल इत्यादि देशों मे चमत्कारों से ओत-प्रोत, प्रभावशाली जादू शो, बडी संख्या में आयोजित हुए। दिखाए गए अद्भुत चमत्कारी जादू शो तथा जादू कला पर लिखी गई तीन ज्ञानवर्धक किताबो पर, डाॅ के सी पांडे को देश की कई राज्य सरकारों व प्रतिष्ठित विदेशी संस्थाओ व संगठनो द्वारा, विभिन्न प्रतिष्ठित जादू शिरोमणि सम्मानों व पुरुष्कारों से नवाजा गया।

जादू मे वृहद तौर पर, शोध कार्य की महत्ता। जादू का समाज में महत्व तथा इस कला का व्यक्ति के आम क्रियाकलापो में क्या महत्व हो सकता है, यह सब जानने समझने के लिए, प्रख्यात जादूगर के सी पांडे द्वारा, इग्नू के सहायक प्रो.अजय माहूरकर के मातहत, 2019 जादू कला मे, (पीएचडी) डाॅक्टरेट की डिग्री हासिल करने वाले, देश की पहली शख्सियत बने। इंदिरा गांधी विश्व विद्यालय मे (1990-2021) उच्च पद पर रहते हुए, स्वैच्छिक अवकाश प्राप्ति तक, डाॅ के सी पांडे द्वारा एनसीईआरटी तथा इग्नू के विषयों मे, जादू विधा का मिश्रण कर, अनेक विषयों को रोचक बनाने मे, बौद्धिक योगदान दिया। वर्तमान मे, बडे स्तर पर आयोजित किए जाने वाले जादू शो के आयोजन बंद कर, डाॅ के सी पांडे द्वारा, मैंटल जादू को ज्यादा महत्व देना आरंभ किया है। जिसे, इस कला के विस्तार के साथ-साथ, दिलचस्पी बढ़ाने वाला, रोचक व अति प्रभावशाली कहा जा सकता है।

प्रख्यात जादूगर, डाॅ के सी पांडे द्वारा, जादू कला पर लिखी गई किताबो का अद्धययन-मनन व उक्त जादू कला की विधा पर रम कर, देश-विदेश मे बने डाॅ के सी पांडे के अनगिनत शिष्यो द्वारा, पत्रों के माध्यम से शिष्य बनाने की गुजारिश की जाती रही है। कुछ शिष्य गुरु के साथ फोटो खिचवा कर, अपने को धन्य समझते रहे हैं। कई जादूगर शिष्यो द्वारा, जादू कला को व्यवसाय के रूप में अपना कर, आजीविका चलाना, जनमानस व बडी हस्तियों के मध्य पैठ बनाकर, नाम व शोहरत कमाना भी शुरू कर दिया है।

जादू कला का अवलोकन व सु-विख्यात जादूगर, डाॅ के सी पांडे से मुलाकात कर अवगत होता है, जादू कला मे पहले वाली विधा धीरे-धीरे कम हो रही है। पहले जादू शो मे पीछे से संगीत बजता था। जादू का सामान भी असीमित होता था। अब मैंटल म्युजिक को प्रमुखता दी जाती है। माइंड इनर्जी से जादू होता है। जादूगर ज्यादा सामान लेकर नहीं चलते हैं।

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भारत में इस समय, पूरी टीम वाले जादूगर करीब बीस-पच्चीस हैं। इन जादूगरो मे सफल सिर्फ आठ-दस को ही माना जा सकता है। बी एस रेड्डी (विशाखापट्टनम), ओ पी शर्मा जूनियर (कानपुर), पी सी सरकार जूनियर (बंगाल), डाॅ के सी पांडे (दिल्ली) तथा आनंद (जबलपुर) नाम के जादुगर वर्तमान मे, उच्च श्रेणी के जादूगरो मे स्थान रखते हैं।

प्रख्यात जादूगर डाॅ के सी पांडे के साथ हुई वार्ता से अवगत होता है, जादू दो तरह का होता है। हाथ की सफाई और सम्मोहन। जादू कोई मायावी वस्तु नहीं, तंत्र-मंत्र नहीं, विज्ञान पर आधारित एक कला है। हाथों की सफाई है। जादू मे एक विज्ञान शामिल है। यह रोजगार के अवसर पैदा करता है। मनोरंजन की दृष्टि से, जादूकला पर्यटन का एक बड़ा संसाधन है। कई कार्पोरेट और सरकारी संगठन अब इस कला का उपयोग, अपने उत्पादों को बढ़ावा देने, पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए कर रहे हैं। जादू कला के द्वारा कम्पनियों व उनके उत्पादों का प्रचार-प्रसार भी किया जा रहा है। सरकार के समाजिक कार्यो का इस कला के माध्यम से प्रचार-प्रसार किया जा सकता है, जो सबसे सस्ता व मनोरंजक है। भारत के जादुई उत्पादों का निर्यात बाजार भी है। यह विभिन्न उत्पादों, नीतियों और योजनाओ के विपडन का एक अच्छा श्रोत है।

अवलोकन कर ज्ञात होता है, अंग्रेजी हुकूमत से पूर्व जादू कला ज्यादा फली-फूली थी। अंग्रेजी हुकूमत व देश को मिली आजादी के बाद इस प्राचीन जादू कला को संरक्षण नहीं मिला। देश मे स्थापित किसी भी सरकार द्वारा, इस कला के संरक्षण व संवर्धन हेतु कोई नीति नहीं बनाई गई। वर्तमान में, टीवी चैनलों मे मनोरंजन के तहत जादू कला के प्रसारण से इस कला की विधा को बल मिला है।

रोजगार व पैसा कमाने की दृष्टि से यह कला व्यवसाइक रूप से महत्वपूर्ण है। पन्द्रह-बीस हजार से एक लाख तक, एक छोटा जादूगर दो-तीन सहयोगियों की मदद से, स्कूलों, गांवो, व्याह- बारातों तथा जन्मदिन आयोजनों में इस कला का प्रदर्शन कर प्रतिमाह कमा सकता है। वर्तमान मे, बडे स्तर पर जादू शो आयोजित करना, बहुत महंगा हो गया है। इस कला का प्रचार-प्रसार, सभागार का किराया व अन्य खर्च ज्यादा महंगे हो गए हैं। बड़े जादूगरोंकी टीम 60 से 120 तक होती है, जिस टीम के प्रबंधन, सामान के रख-रखाव व ट्रांसपोर्टेशन पर काफी खर्च करना पड़ता है।

देश मे जादू कला शिक्षा व तकनीक की कोई सरकारी नीति, प्रोत्साहन व संरक्षण तथा जादू कला अकादमी के अभाव मे, भारत की यह प्राचीन मनोरंजक जादू कला, धीरे-धीरे पतन की ओर अग्रसर हो रही है। भारत में कुछ जादूगरों के व्यक्तिगत प्रयास से ही यह मनोरंजक कला जिंदा बची है। स्थापित सरकारों व नीति-निर्माताओ को चाहिए, वह शोध कार्यो के द्वारा इस कला के महत्व को भारत के प्राचीन प्रसिद्ध विश्व विद्यालयों तक्षशिला, नालंदा व विक्रमशिला मे, जादू कला की शिक्षा क्यों सिखाई जाती।

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