उत्तराखंड :आए दिन प्रकृति का कहर, आखिर कब लेंगे सबक?

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दिनेश तिवारी एडवोकेट , पूर्व उपाध्यक्ष विधि आयोग

पहाड़ के लिए आपदाएँ कोई नयी बात नहीं है । पहाड़ और प्राकृतिक आपदाओं का रिश्ता पहाड़ों के जन्म के साथ ही जुड़ा हुआ है । इस लिहाज़ से १८ अक्टूबर की आपदा अतीत की प्राकृतिक आपदाओं की भयावहता का क्रूर विस्तार है । प्रकृति के क़हर से एक ही क्षण में सब कुछ तबाह होते हुए देखना , झेलना पहाड़ के लोगों की नियति है ।पहाड़ ने अपने भाग्य में रोज़ ही १८ अक्टूबर को देखा और भोगा है । हाँ इसमें अगर कुछ अलग है तो वह सिर्फ़ घटना की तारीख़ , घटना का स्थान , आपदा के शिकार लोगों के नाम व पते हैं । विनाश की पुनरावृति की दास्तान सदियों से चली आ रही दुखांत पटकथा का एक हिस्सा है और इस पटकथा को लिखने वाले का नाम प्रकृति तो है ही प्रकृति के साथ अपने निजी लाभ के लिए छेड़ – छाड़ करने वाली व्यवस्था भी है ।

उत्तराखंड राज्य के लिए यह संभव हो जाना चाहिये था कि वह अपने नागरिकों की प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा करने के लिए आपदाओं से निपटने और तत्काल सहायता पहुँचाने का प्रभावी तंत्र विकसित कर पाता । पर वह ऐसा करने में विफल साबित हुआ और राज्य के इक्कीस वरस आपदाओं से निपटने के लिए कारगर नीति बनाने के लिहाज़ से फिसड्डी साबित हुए । यही कारण है कि हरसाल आने वाली प्राकृतिक आपदा से भारी जान – माल का नुक़सान होता है और सरकारें नुक़सान का आकलन करने , मुआवज़ा वितरण करने तक अपनी भूमिका सीमित कर अपने दायित्व से पिंड छुड़ा लेने की नीति पर यक़ीन रखतीं हैं । मामला चाहे फिर १६-१७ जून २०१३ को आयी विनाशकारी केदारनाथ आपदा का हो या फिर १८ अक्टूबर २०२१ का प्राकृतिक क़हर , दोनों ही मामलों में सरकार बहादुर का कार्य व्यवहार एक सा रहा है ।

इतिहास अनेक ऐसी बड़ी प्राकृतिक त्रासदियों का गवाह रहा है जब पहाड़ के अनेक गाँव ज़मींदोज़ हो गए और कई सभ्यताएँ नष्ट हो गयीं । यह असफलता हमारे हिस्से आज भी चिपकी हुई है कि आपदाओं को समझने और फिर निपटने में पूरा सिस्टम कमज़ोर , लाचार और बेबस नज़र आता है ।और बेशक़ीमती इंसानी जिंदगियाँ मलवे के ढेर में असमय दफ़्न हो जाती रही हैं । हमेशा की तरह इस बार भी एसडीआरएफ और अन्य संस्थाओं , संगठनों के कमान संभालने के बाद हालात को संभालने की कोशिश हुई लेकिन तबतक जन माल का जो नुक़सान होना था वह तो हो चुका था । यह सवाल तो है ही कि अगर पत्रकार आनंद नेगी को मलवे से तुरंत ही निकाल सकने का सिस्टम हमारे पास होता तो वह आज अपनी चित- परिचित मुस्कान के साथ हमारे बीच जीवित होते । यह समझा जा सकता है कि अगर मलवे में दबने के २६ घंटे के बाद किसी को खोदकर एसडीआरएफ बाहर निकाले तो उसकी मौत की ख़बर के अलावा और हाथ क्या आ सकता है ? यह भी सही है कि इस साल अक्टूबर माह की असमय बारिश ने पुराने सभी रिकार्ड पीछे छोड़ दिए हैं मौसम विभाग ने कुमाऊँ के पंतनगर और मुक्तेश्वर में २४ घंटे के दौरान हुई सबसे ज़्यादा बारिस के आँकड़े जारी किए हैं । इन आँकड़ों के अनुसार इन दोनों स्थानों पर पिछले २४ घंटों के दौरान हुई वर्षा अब तक के ऑल टाइम रिकार्ड से क़रीब दो गुना हुई है ।पंतनगर में बारिश के आँकड़े २५ मई १९६२ से दर्ज किए जा रहे हैं . पंतनगर में २४ घंटे के दौरान १० जुलाई १९९० को सबसे ज़्यादा २२८ मिमी वर्षा हुई थी लेकिन १८ अक्टूबर २०२१ सुबह साढ़े आठ बजे से १९ अक्टूबर की सुबह साढ़े आठ बजे तक यहाँ ४०३.२ मिली वर्षा रेकार्ड की गयी . मुक्तेश्वर में भी १ मई १८९७ से वर्षा के आँकड़े संग्रह किए जा रहे हैं । मुक्तेश्वर में२४ घंटे के दौरान सबसे ज़्यादा बारिश १८ सितम्बर१९१४ को २५४.५ मिली दर्ज की गयी थी . जबकि इस बार २४ घंटे के दौरान ३४० .८ मिली बारिश संग्रह हुई है ।

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यह २०१३ जून से मिलती जुलती हुई हालत है तब जून के पीक सीज़न में किसी ने भी कल्पना नहीं की थी कि क़ुदरत का क़हर केदारनाथ घाटी का भूगोल ही बदल देगा यह घटना भी प्राकृतिक आपदाओं के इतिहास की विरल त्रासदियों में से एक है । १८ अक्टूबर की असमय की महाआपदा से पर्यावरण विशेषज्ञों , वैज्ञानिकों की चिंता का बढ़ना भी लाज़मी ही है उतराखंड वानिकी एवं औद्याानिकी विश्व विद्यालय के पर्यावरण विभाग के अध्यक्ष और भू वैज्ञानिक डॉक्टर एसपी सती का कहना है कि यदि मानसून को हटा दिया जाय तो इस बार वातावरण में जून २०१३ जैसी स्थिति बनती हुई दिखी । उनके अनुसार एक मज़बूत पश्चिमी विक्षोभ उत्तराखंड में सक्रिय था और इसी के कारण इस इलाक़े में एक कम दबाव वाला क्षेत्र बन गया । इसका परिणाम यह हुआ कि बंगाल की खाड़ी तक की हवाएँ इस क्षेत्र में जमा हो गयीं जिसके कारण यह अप्रत्याशित वर्षा रही “.
आँकड़ों की अगर मानें तो प्राकृतिक आपदा से ४०० से अधिक गाँव प्रभावित हुए हैं . वर्ष २०१५ तक ऐसे गाँवों की संख्या २२५ थी जो कि प्राकृतिक आपदा के कारण भूस्खलन के शिकार हैं . एक संस्था है ‘काउंसिल आन एनर्जी इन इन्वायरॉन्मेंट एंड वॉटर “. जिसे सीईईडब्लू भी कहा जाता है इसकी एक रिपोर्ट बताती है कि उतराखंड में १९७० की अलकनंदा बाढ़ के बाद त्वरित बाढ़ , भूस्खलन , बादल फटने हिमनदझीलों के फटने और बिजली गिरने जैसी आपदाओं में लगभग चार गुना वृद्धि हुई है ।इन आपदाओं की जद में राज्य के ८५ प्रतिशत जिलों की ९० लाख से अधिक आबादी आ गयी है । रिपोर्ट में इन आपदाओं का कारण पर्यावरण के प्रति लापरवाही और उपेक्षा बताया है । अभी गुज़रे ७ फ़रवरी को भारत तिब्बत सीमा से लगी नीति घाटी में ऐसी ही प्राकृतिक आपदा का क़हर बरपा । ऋषि गंगा नदी के ऊपरी जलग्रहण इलाक़े में हिमनद का एक बड़ा हिस्सा टूटकर नदी में गिर जाने की वजह से नदी का जलस्तर बढ़ गया था । इस जलप्रलय के कारण आयी बाढ़ से इस इलाक़े में भारी तबाही हुई और ऋषिगंगा जलविद्युत परियोजना और धौलीगंगा नदी पर बनी बन रही तपोवन विशनुगाड जलविद्युत परियोजना को भारी नुक़सान झेलना पड़ा ।
यह जानना महत्वपूर्ण है कि केन्द्रीय गृहमंत्रालय के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधसंस्थान की २०१३ की आपदा पर तैयार की गयी अध्ययन रिपोर्ट में भी योजनकारों और योजनाओं को लागू करने वाली संस्थाओं से केदारनाथ महाविनाश से सीख लेने को कहा गया था ।हिमालयी इलाक़ों में भूस्खलन और अन्य पर्यावरणीय समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार एनटीपीसी सहित कई बड़ी कम्पनियों पर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण द्वारा आर्थिक दंड ठोका जाता रहा है १६-१७ जून २०१३ की केदारनाथ आपदा के कारणों का पता लगाने के लिए राष्ट्रीय आपदा संस्थान की टीमों ने आपदा प्रभावित इलाक़ों का गहन सर्वेक्षण और अध्ययन करने के बाद तीन खंडों में रिपोर्ट तैयार की थी । इस रिपोर्ट में उन्नीस सिफ़ारिशों के साथ यह स्वीकार किया गया था कि जलविद्युत परियोजनाओं के अलावा तमाम बड़ी परियोजनाएँ हिमालयी क्षेत्र में एक ओर जहाँ पर्यावरणीय समस्याओं को पैदा कर रही हैं वहीं बाढ़ , भूस्खलन , भू-धसाव , जल स्रोतों के सूखने और वन्यजीवों व सामान्य जनजीवन को भी भारी नुक़सान पहुँचाने का कारण बन रही हैं । आपदाओं के दंश को झेल रहे पहाड़ की वेदना को समझने के लिए वाडिया इंस्टिट्यूट आफ हिमालयन जियोलाॅजी ( डब्लूआइएच ) के वैज्ञानिकों के इस अध्ययन को पढ़ना और समझना भी हितकर है कि पहाड़ों की धारक क्षमता की अनदेखी कर किए जा रहे बेतहाशा निर्माण कार्यों ने भूस्खलन भू-धसाव की सम्भावनाओं को बढ़ा दिया है । पहाड़ों में भवन निर्माण के अलग से कोई मानक नहीं हैं । अभी तक पहाड़ी ढलानों पर बनने वाले मकानों के लिए मैदानों के लिए बने मानकों का ही इस्तेमाल हो रहा है। हक़ीक़त यह भी है कि जानकारी के अभाव में पहाड़ों में मकान बिना किसी मानक या तकनीकि के बनते या बन रहे हैं । पहाड़ों के बड़े हिलस्टेशन और प्रमुख शहर पहाड़ी ढालों पर ही निर्मित हैं । यह सही है कि पिछले दो एक दशकों से अल्मोडा़ , नैनीताल , मसूरी , रानीखेत , चकराता , पि्थोरागढ़ जैसे पहाड़ी शहरों में बहुत तेज़ी के साथ शहरीकरण और स्वाभाविक रूप से जनसंख्या में हुई वृद्धि दर्ज की गयी है । पहाड़ों में पर्यटकों के अलावा बाहर से आ रहे ग़ैर पहाड़ी समुदायों की आमद लगातार बढ़ने से भी पहाड़ों पर दबाव बढ़ा है । लेकिन विकास का कोई पहाड़ी माडल नहीं होने और पहाड़ी ढालों पर मकान बनाने के लिए मैदानों के मानक को ही अपनाए जाने से पहाड़ भूस्खलन , भ-ूधसाव के ख़तरों से घिरते जा रहे हैं । हालाँकि आइआइटी रुड़की का भूकंप इंजीनियरिंग विभाग पहाड़ी ढालों पर भवन निर्माण के लिए अलग से मानक तैयार करने के काम में जुटा है । अगर ऐसा कर सकने में वह कामयाब होता है तो देश में पहली बार पहाड़ी ढालों पर भवन निर्माण के लिए अलग मानकों की माँग पूरी हो सकेगी ।

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इस कड़ी में यह समझना भी ज़रूरी हो जाता है कि पहाड़ों को मैदान के चश्मे से देख कर विकास की योजनाओं को बनाना पहाड़ को भारी आपदाओं के दलदल में जानबूझकर धकेलना है । केंद्रीय सड़क और राजमार्ग मंत्रालय का २०१२ का वह सर्कुलर भी पहाड़ों में भूस्खलन को आमंत्रण दे रहा है जिसके अनुसार संवेदनशील पहाड़ों में सड़क की चौड़ाई का मानक मैदानी क्षेत्रों की तरह बना दिया गया है । इसके अनुसार पहाड़ों के लिए मान्य ५.५ या ६ मीटर के स्थान पर ८ या ८.५ मीटर यानी कि कुल चौड़ाई १२ मीटर ) की सड़क के निर्माण का प्रावधान किया गया है । यह सर्कुलर पहाड़ों के लिए बहुत विध्वंसक है जिसका विरोध होने पर सड़क मंत्रालय ने २३ मार्च २०१८ को नया सर्कुलर जारी कर पहाड़ों के लिए सड़क की चौड़ाई पाँच से सात मीटर को ही मान्यता दी है । और डबल लेन विद पेव्ड शोल्डर को खारीज़ कर दिया लेकिन इसे लागू नहीं किया । पहाड़ों का यह दुर्भाग्य बना हुआ है कि इसकी अतिसंवेदनशीलता को अभी तक समझा नहीं गया है और सैकड़ों सुप्त और सक्रिय भूस्खलनों को चिन्हित किए जाने के बाद भी वैज्ञानिकों की राय की लगातार और घोर उपेक्षा जारी है ।

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