रानीखेत: यथावत शहर,जड़वत नागरिक

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कलम की नोक पर

इस माटी की पैदाइश होने के नाते यह सवाल मुझे बेचैन करता है कि 150 साल के इस शहर को आखि़र किस की नज़र लगी?क्या हमने कभी सोचा कि 150 साल बाद भी यह शहर कहां खड़ा है, मुकाबिल अन्य हिल स्टेशनों के? कुदरत ने इस शहर को जितनी नेमत दी है उतना ही सियासत ने इस शहर को पंगु बना छोड़ा है। हालात यह हो गए हैं कि हम सब सियासतदानों के हाथों में खेलते हुए जन सुविधाओं का अधिकार पाने की लड़ाई तक लड़ना भूल चुके हैं। क्या हमने कभी सोचा कि सियासत का जयकारा लगाती भीड़ बनने के बजाए हमने एक रहवासी होने के नाते शहर के विषय में चिंतन-मनन कर संगठित संघर्ष किया होता तो शहर की तस्वीर कहीं उजली होती।

सच यही है कि शहर के रहवासियों का जड़वत बने रहना इस बिखरते- पिछड़ते शहर के लिए खतरनाक साबित हुआ है।
अगर यह कहा जाए कि कभी गौरवशाली अतीत की आभा से दमकता यह शहर सियासत के डलावघर में समाविष्ट हो चुका है तो अतिश्योक्ति न होगी। जन आंदोलनों से अदम हो चुके इस शहर की पतनोन्मुखी गाथा को समझने के लिए क्या यह काफी नहीं कि किसी दौर में वृहद भौगालिक परिवेश लिए प्रदेश की बड़ी तहसीलों में शुमार रानीखेत तहसील वर्तमान में एक प्रभारी तहसीलदार के हवाले कर दी गई है जिसके पास पहले से आधा दर्जन तहसीलों का प्रभार है। इसी शहर में एक ऐसा बड़ा सरकारी अस्पताल भी है जो कभी कोसों दूर रहने वाले ग्रामीण रोगियों तक के लिए जीवन बचाने की आस था लेकिन आज चिकित्सकों और स्वास्थ्य संसाधनों के अभाव में स्वयं अपनी सांसे गिन रहा है।गाहे-बेगाहे शहर के वातावरण में नगर पालिका और जिले के सृजन की तारी हो उठती अनुगूंज भी सियासत की गिरोहबंदी में कहीं फंस कर रह गई है, इन्हें लेकर बस सवाल-जवाब और कागजी उड़ानों का सिलसिला सालों से चलता रहा है।कभी सैलानियों की पहली पसंद रहा चौबटिया राजकीय सेब बागान भी सरकारी निकम्मेपन का शिकार हो चुका है। उद्यान निदेशालय का संचालन जहां देहरादून से किया जा रहा है वहीं अनेक सरकारी कार्यालय पलायन कर गए है और नए सरकारी विभागों के खुलने की उम्मीद भी धूमिल है जिसका सीधा असर यहां के घटते व्यापार पर दिखाई देने लगा है। एक अदद खेल मैदान की मांग करते तबके नौजवान खिलाड़ी आज बूढ़े हो चले हैं और सियासत है कि बेशर्मी से इस ’मैदान‘ पर खेलती रही है।पर्यटक शहर में एक मात्र पर्यटन कार्यालय का बरसों से वीरान पड़े रहना सरकार की पर्यटन व्यवसाय के प्रति ’संजीदगी‘ का नमूना कहा जा सकता है।छावनी परिषद से संबंधित नागरिकों की दुश्वारियां सालों से उसकी नियति बनी हुई हैं।
राज्य बनने के बाद रानीखेत के नागरिकों की उम्मीदों का आसमान और ऊंचा हो गया। लगा था अपने बीच से गए भाग्यविधाता उनकी पीर हर लेंगे लेकिन आज भी परिदृश्य उसी पीड़ा से भरा है जो दशकों पहले थी। हां, इतना बदलाव जरूर हुआ कि सियासत के पंजों ने उस युवा पीढ़ी को दबोच लिया जो जन सरोकारी आंदोलनों में प्रथपांक्तेय बनी रहती थी। ये ’रणबांकुरे’ सियासत के ग्लैमर और स्वार्थ, लोभ के वशीभूत आज सियासत की खोह में समा चुके हैं।

सच्चाई यही है कि सियासत की गिरोहबंदी ने शहर में अपने अधिकार के लिए उठने वाली इंकलाबी मुट्ठियों को बे-जान कर छोड़ा है और आंदोलन की जमीन को बंजर। ऐसे में आंदोलनों से अदम हो चुके शहर में लस्त-पस्त पड़े चेहरे विकास की लड़ाई के लिए उम्मीद करें भी तो किससे? उनकी प्रश्न भरी निगाहें शायद यही सवाल कर रही हैं कि क्या अब कभी अपने अधिकारों और शहर के विकास के लिए कोई जनोन्मुखी आंदोलन सिर उठा पाएगा? क्यों कि आंदोलनों का जन हिस्सा सियासत में समा चुका है और जो बचा है वह शहर की दो धु्रवीय सियासत का वितंडा देखने को विवश है।नाउम्मीदी से घिरा शहर अपनी 150वीं वर्षगांठ मना रहा है अगले साल 151वीं भी मना लेगा, क्या फर्क पड़ता है शहर यथावत है और हम जड़वत। (प्रकृतलोक के पिछले अंक से)

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