लो फिर आसान से आसमान हुआ नगर पालिका का सपना,केंद्र सरकार छावनी परिषद के ढांचे में ही असेंबल करेगी नगरपालिका जैसी सुविधाएं

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विमल सती

रानीखेत: इस मानसून सत्र में संसद में लाए जाने के लिए प्रस्तावित 32 विधेयकों में से जिन 24 विधेयकों का मसौदा तैयार कर सूचीबद्ध किया गया है उनमें छावनी परिषद 2022 विधेयक भी शामिल है। बताया जा रहा है कि इस विधेयक के पास होने के बाद छावनी ढांचे का अधिक लोकतंत्रीकरण और आधुनिकीकरण किया जा सकेगा।प्रस्तावित विधेयक में नए व आधुनिक नगर पालिका अधिनियम को लागू करना तथा नागरिकों के लिए सुविधाजनक जीवन पर विचार करना शामिल है।

पिछले माह एक कार्यक्रम में रानीखेत आए केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री अजय भट्ट ने रानीखेत नगर पालिका के सवाल पर संकेत दिया था कि केंद्र सरकार छावनी परिषदों को नगर पालिका में तब्दील करने के बजाय छावनी परिषदों के ढांचे के भीतर ही नगर पालिकाओं जैसी कार्य प्रणाली और व्यवस्थाएं मुहैया कराने जा रही है।तब उनका इशारा मानसून सत्र में लाए जा रहे छावनी परिषद2022 विधेयक की ओर ही था जिसे लेकर पिछले कुछ वर्षों से अंतिम रूप देने पर विचार विमर्श चल रहा था । प्रस्तावित नए विधेयक की मुख्य विशेषताओं में अन्य बातों के साथ साथ छावनी बोर्ड में निर्वाचित सदस्यों की संख्या में वृद्धि करना, छावनी ढांचे का अधिक लोकतंत्रीकरण और आधुनिकीकरण, निर्वाचित प्रतिनिधियों को अधिक वित्तीय शक्ति प्रदान करना शामिल है।
इस हेतु एक कमेटी गठित की गई थी जिसने पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न छावनियों के नागरिकों से राय मांगी थी और उसके आधार पर नया मसौदा विधेयक सार्वजनिक किया था।मसौदे में कहा गया कि छावनी क्षेत्रों में निवासियों के कल्याण और देश में छावनी बोर्डो में लोकतांत्रिक ढांचे को बनाए रखने के लिये समिति यह सिफारिश करती है कि नए छावनी विधेयक को अविलंब अंतिम रूप दिया जाए और इसे यथाशीघ्र संसद में प्रस्तुत किया जाए ।अब छावनियों के प्रशासन और छावनी बोर्डों की भूमिका पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत और छावनी नागरिकों के जीवन को सुविधाजनक बनाने के क्रम में चालू मानसून सत्र में छावनी परिषद विधेयक 2022 संसद के पटल पर प्रस्तुत किया जा रहा है।
बताते चलें कि छावनी परिषद् विधेयक 2022 पारित होने के बाद देश की समस्त छावनी परिषदों में छावनी बोर्डों के चुनावों का रास्ता भी साफ हो जाएगा जो कि 2020 में कार्यकाल समाप्ति के बाद से नहीं हुए हैं। छावनी क्षेत्रों के निवासियों और छावनी बोर्डों के लोकतांत्रिक कामकाज से संबंधित विभिन्न प्रावधान नए छावनी विधेयक के अधिनियमन पर निर्भर करते हैं और ऐसा ही एक प्रावधान देश के विभिन्न छावनी बोर्डो में चुनाव आयोजित करवाना है।

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जैसा कि विदित है छावनी परिषद रक्षा मंत्रालय की स्वायत्त संस्था है। जो नगर पालिका की तरह ही स्थानीय निकाय का कार्य देखती है। छावनी परिषद के वार्ड से नागरिक सभासद की तरह अपना सदस्य चुनती है।उदाहरणार्थ रानीखेत छावनी में 7 वार्ड हैं। निर्वाचित सदन का कार्यकाल पांच साल के लिए होता है। जबकि चुनाव न कराने की दशा में छह-छह माह का दो बार विस्तार किया जा सकता है। पिछली बार फरवरी 2015 में छावनी परिषद का चुनाव हुआ था। इसका कार्यकाल फरवरी 2020 में पूरा हो गया। विस्तार मिलने के बाद इस साल सदन भंग कर वैरी बोर्ड लागू किया गया। वैरी बोर्ड में स्टेशन कमांडर अध्यक्ष होते हैं जबकि परिषद के सीईओ सदस्य सचिव हैं जबकि नागरिकों से एक नामित सदस्य रक्षा मंत्रालय द्वारा मनोनीत है।यह एक तरह की तदर्थ व्यवस्था और छावनी क्षेत्रों में रहने वाले निवासियों के उचित प्रतिनिधित्व के लिये नियमित चुनाव की आवश्यकता होती है।छावनी परिषद 2022 विधेयक आने के बाद छावनी बोर्डों के चुनाव प्रक्रियागत ढंग से शुरू होने की उम्मीद जतायी जा रही है।
जैसा कि संसद में लाए जा रहे छावनी विधेयक का उद्देश्य छावनी ढांचे का अधिककाधिक लोकतंत्रीयकरण,आधुनिकीकरण और दक्षता प्रदान करने के लिए छावनियों का प्रशासन और नगर पालिकाओं के साथ जुड़े अधिकाधिक विकास उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए छावनियों में जीवन की सुगमता की सुविधा प्रदान करना बताया गया है। लोकसभा सचिवालय द्वारा जारी एक बुलेटिन के अनुसार, छावनी विधेयक में देश भर की नगर पालिकाओं के साथ संरेखण में अधिक से अधिक विकास के उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रस्ताव है और छावनियों में जीवन को आसान बनाने की सुविधा का प्रस्ताव है। 
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इस वर्ष की शुरुआत में छावनी क्षेत्रों में निवासियों के कल्याण और देश में छावनी बोर्डो में लोकतांत्रिक ढांचे को बनाए रखने के मकसद से संसद की एक समिति ने नए छावनी विधेयक को अविलंब अंतिम रूप देने और इसे यथाशीघ्र संसद में प्रस्तुत करने की सिफारिश की थी।
संसद में पेश रक्षा संबंधी स्थायी समिति के 26वें प्रतिवेदन में कहा गया कि भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची की प्रविष्टि 3 में कहा गया है कि छावनी क्षेत्रों के परिसीमन, इन क्षेत्रों के स्थानीय स्वशासन, छावनी प्राधिकारियों के गठन और शक्तियों एवं किराए के नियंत्रण सहित आवास के विनियमन के लिये कानून बनाने में संसद सक्षम है।इसलिए संसद में छावनी परिषद विधेयक को अविलम्ब लाया जाए।
अब जबकि इस मानसून सत्र में उपरोक्त विधेयक लाया जा रहा है देश की सभी छावनी परिषदों के नागरिकों की नजरें इस पर लगी है।छावनियों के भीतर कठोर कानूनों की चाबुक से सताए नागरिक वर्षों से नगर पालिका की मांग करते आए हैं लेकिन इस विधेयक के मसौदे से साफ है कि केंद्र सरकार फिलवक्त नगर पालिकाओं का जामा पहनाने के लिए छावनियों का देहदान करने के मूड में नहीं है अपितु छावनियों के देह ढांचे में नगर पालिका जैसी कोई ‘आत्मा’ लोकतंत्रीय,आधुनिकीय जैसे शब्दों के साथ असेंबल करना चाहती है।इस विधेयक के आने के बाद छावनी नागरिकों के जीवन को कितना सुगम व सुविधाई बनाया जा सकेगा ये तो भविष्य के गर्भ में है, हाँ इतना जरूर है कि छावनी विधेयक के पास होने के बाद नागरिकों का पूर्ण नगर पालिका का स्वप्न आसमानी जरूर हो गया है।

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