उत्तराखंड विधान सभा चुनाव 2022 मे बदलते सियासी समीकरण

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सी एम पपनैं

उत्तराखंड की पांचवी निर्वाचित विधानसभा के लिए हो रहा चुनाव, सियासी रूप से कई मायनो मे दिलचस्प बनता जा रहा है। विगत चार विधानसभा चुनावो मे मतदाताओं द्वारा बडे जतन से, हर पांच साल बाद, अदल-बदल कर कांग्रेस व भाजपा को सत्ता हस्तांतरण किया है। स्थापित सरकारों के राज-काज से, जनमानस कितना लाभान्वित हुआ या उसको कितना खामियाजा भुगतना पड़ा, जनमानस के मन मस्तिष्क मे रमा हुआ तथा धरातल पर दृष्टिगत है।

एक बार पुन: 14 फरवरी को ईवीएम का बटन दबा कर, उत्तराखंड के 82,38,187 कुल मतदाताओ, जिनमे 42,24,288 पुरुष, 39,19,334 महिला तथा 93,964 सर्विस मतदाता हैं, अपने बहुमूल्य मत का प्रयोग कर, 632 चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों मे से, किन्ही 70 प्रत्याशियों का चुनाव करने जा रहा है।

एक फेस मे सम्पन्न किया जा रहा, उत्तराखंड विधानसभा चुनाव का मतदान, 11,647 मतदान केन्द्रो पर, प्रात: 8 से सांय 6 बजे तक होना है। 10 मार्च 2022 को मतपत्रों की गणना कर, परिणाम घोषित होने हैं। मतदान केन्द्रो की सुरक्षा को लेकर प्रशासन ने कमर कसी हुई है। 1842 संवेदनशील बूथों पर सुरक्षा व्यवस्था का जिम्मा केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बल की 60 से अधिक कम्पनियों के कन्धों पर सौंपी गई है। 1034 संवेदनशील बूथ, 808 अतिसंवेदनशील बूथों मे, 400 उधम सिंह नगर, 300 हरिद्वार, 200 देहरादून तथा 100 से अधिक नैनीताल व पिथोरागढ में इंगित किए गए हैं।

निर्वाचन सम्बंधी, उत्तराखंड राज्य स्तरीय, जन शिकायत व सुझाव हेतु, राम मोहन मिश्रा आईएएस (सेवानिर्वत) को विशेष सामान्य प्रेक्षक तथा अनिल कुमार शर्मा को विशेष पुलिस प्रेक्षक के तौर पर, भारत निर्वाचन आयोग द्वारा, विधानसभा सामान्य निर्वाचन 2022 के संपादन के लिए नियुक्त किया गया है। कानून और शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन सर्तक है।

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2022 मे, भाजपा व कांग्रेस के पुरानी पीढी के समर्पित खाटी नेता, इक्का-दुक्का को छोड़कर, सब परिदृश्य से लगभग बाहर हो चुके हैं। युवा पीढी के नए चेहरे, सियासी दलों की चकाचौध का अवलोकन कर, संघर्ष, चतुराई व जुगाड़ के बल, टिकट हासिल कर, अपनी हैसियत बढ़ा रहे हैं। बीजेपी व कांग्रेस के बीच अधिकतर सीटों पर कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है। इनमे से कोई भी दल, एक सीट का भी नुकसान का रिश्क नहीं लेना चाह रहा है।

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मुख्य राजनैतिक दलों, कांग्रेस और भाजपा की हालत पतली नजर आ रही है। किसी भी दल को पूर्ण बहुमत मिलता नहीं दिखलाई पड़ रहा है। भले ही दावे कुछ भी किए जा रहे हो। टिकट बटवारे ने दोनों सियासी दलों के समीकरण कमजोर किए हैं। पार्टियों से जुडे वफादार व निष्ठावानो को तरजीह नहीं मिलने से, उनके अंदर खटास पैदा हुई है, जिस कारण उक्त सियासी दलों को इस बार अप्रत्याशित परिणाम दिखने को मिल सकते हैं। बागियों, भीतर घातियों व असंतुष्टों को न संभाल पाना, उनका चुनाव मैदान में बना रहना, उक्त सियासी दलों के लिए घातक साबित हो रहा है। उक्त पार्टियों से जुडे दिग्गजो को अपनी प्रतिष्ठा बचाना मुश्किल नजर आ रहा है।

2017 मे राज्य की चौथी विधानसभा का चुनाव, भारी भरकम सीटों पर विजय हासिल कर, सत्ता मे बैठी, भाजपा राज्य सरकार द्वारा कोई प्रभावशाली कामकाज या राजनीतिक गतिविधियों के द्वारा जनमानस के मध्य कोई सदभाव नहीं बनाया गया। जिस कारण जनमानस के मध्य ऐंटीइंकमबैंशी अधिक दिखाई दे रही है। दिल्ली में बैठे शीर्ष आलाकमान द्वारा, राज्य मे तीन मुख्यमंत्री बनाकर, पार्टी को कई खेमो मे बाट दिया है। राज्य कैबिनेट मे पदासीन रहे, दो बडे जनाधार वाले मंत्रियों द्वारा, भाजपा छोड़, कांग्रेस मे वापसी कर ली गई है। ऐसी ही कुछ गलतियां कांग्रेस शीर्ष आलाकमान द्वारा भी 2016-17 मे की गई थी। उसका खामियाजा भुगता था।

सियासी दलों की गलतियों का लाभ, 2022 के चुनाव मे भी, बागी उम्मीदवारों को मिल सकता है, जो जनसरोकारों से निरंतर जुडे रहे हैं। भाजपा के पन्द्रह व कांग्रेस के सात बागी, पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ चुनाव लड़, पार्टी के नेताओ व प्रत्याशियों की धड़कन को बढ़ाए हुए हैं।

प्रत्याशियो की हार जीत को लेकर उत्तराखंड मे, दाव लगने शुरू हो गए हैं। सट्टे की जानकारी भी मिल रही है। चुनाव प्रचार के दौरान आपसी झड़प के साथ-साथ, अवैध तरीके से लाया जा रहा करोडो रूपया, शराब, बीयर तथा प्रचार सामग्री की बडी खेप भी पकड़ी जा रही है। पुलिस के साथ ही एसओजी और एसटीएफ कार्यवाही करने के लिए अलर्ट हैं।

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राज्य मे पहली बार, आम आदमी पार्टी भी तीसरे विकल्प के तौर पर, उभरती नजर आ रही है। पूरी रणनीति और संसाधनों के साथ पूरी 70 सीटों पर प्रत्याशी खडे कर, मैदान में कूदी हुई है। जो कई सीटों पर कांग्रेस और भाजपा को टक्कर देती नजर आ रही है। आम आदमी पार्टी, उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में उस रणनीति पर अमल करती नजर आ रही है, जिसके दम पर भाजपा ने पूरे देश मे अपना विस्तार किया है और कई राज्यो मे अपना दबदबा बना सरकार बनाई है।

मात्र कुछ चुनिंदा सीटों पर यूकेडी भी चुनाव को त्रिकोणीय बनाए हुए, नजर आ रही है। सपा, बसपा व अन्य प्रत्याशियो का कोई दबदबा नजर नही आ रहा है। आंशिक रूप से ये सभी वोट काटते नजर आ रहे हैं।

2022 के चुनाव में गढ़वाल मंडल के सात जिलों की 41 सीटों पर 391 तथा कुमांऊ मंडल के छह जिलों की 29 सीटों पर 241 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। देहरादून जिले की 10 सीटों पर 117, हरिद्वार की 11 सीटों पर 110, उधमसिंह नगर 9 सीटों पर 72, नैनीताल 6 सीटों पर 63, अल्मोडा 6 सीटों पर 50, पौडी 6 सीटों पर 47, टिहरी 6 सीटों पर 38, चमोली 3 सीटों पर 31, पिथौरागढ 4 सीटों पर 28, रुद्रप्रयाग 2 सीटों पर 25, उत्तरकाशी 3 सीटों पर 23, बागेश्वर 2 सीटों पर 14 तथा चम्पावत जिले में 2 सीटों पर 14 प्रत्याशी मैदान मे हैं।

2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी 46.5 फीसद वोट प्राप्त कर 57 सीट तथा कांग्रेस 33.5 फीसद वोट प्राप्त कर 11 सीट ही जीत पाई थी।

उत्तराखंड मे आक्रामक चुनाव प्रचार चल रहा है। सभी दलों व प्रत्याशियों द्वारा, जनसंपर्क व वर्चुअल प्रचार के लिए ताकत झोंकी हुई है। मुख्य सियासी दलों के दर्जनों शीर्ष नेता, चुनाव प्रचार मे कूद पडे हैं। बीजेपी की अगुवाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर रहे हैं। प्रधानमंत्री की वर्चुअल रैली की शुरुआत 4 फरवरी को अल्मोडा से शुरू होनी थी, जो मौसम खराब होने के कारण रद्द करनी पडी। अब 6 को पौडी, 8 को टिहरी, 10 को हरिद्वार व 12 को नैनीताल मे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वर्चुअल रैली होनी है। एक वर्चुअल रैली के जरिए करीब पन्द्रह हजार लोगों तक पहुचने का बीजेपी का टारगेट है। कुल मिलाकर राज्य मे बीजेपी का चुनाव, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे और केन्द्र सरकार की ओर से घोषित की गई, बडी परियोजनाओ के भरोसे ही चल रहा हैं।

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कांग्रेस को जिताने में, हरीश रावत के माथे पर जीत दिलाने की सबसे अधिक जिम्मेदारी बनी हुई है। राहुल गांधी व प्रियंका गांधी के साथ-साथ कांग्रेस के कई अन्य शीर्ष नेता भी उत्तराखंड में चुनाव प्रचार कर रहे हैं। लेकिन हरीश रावत के लिए उत्तराखंड मे ताकत दिखाने का यह अंतिम मौका देखा जा रहा है।

उत्तराखंड मे दो दशक से चलायमान सियासी परिपाठी, जिसके तहत, हर पांच साल पर सत्ता की रिवायत बदलती चली आ रही थी। 2022 के विधान सभा चुनाव में राज्य के नियोजित विकास, रोजगार, पलायन की बढती समस्या, शिक्षा, स्वास्थ, खेती- किसानी, जंगली जानवरो का आतंक, महंगाई व जन सरोकारों से जुडे मुद्दों से, कोसों दूर, राष्ट्रवाद और हिंदुत्ववाद जैसे मुद्दों पर, जिस प्रकार देश की राजनीति ने करवट ली है, उसका असर उत्तराखंड मे भी देखने को मिल रहा है।

विधानसभा के इस चुनाव में, सियासी दलों को जीत हासिल करने के लिए, किसी अन्य गैर जरूरी मुद्दों को तूल देने के बजाए, अवलोकन करना होगा कि, उत्तराखंड मे 25 फीसद मतदाता बुजुर्ग हैं। स्वास्थ सुविधाओ के अभाव में, पर्वतीय अंचल के दूर दराज के गांवो मे, जीवन व्यतीत कर रहे, इन बुजुर्गो को, सदैव स्वास्थ सुविधाओ की दरकार रही है। जिस पर स्थापित सरकारों द्वारा कभी ध्यान नहीं दिया गया है।

साथ ही उत्तराखंड मे, 18 से 40 आयु वर्ग के युवा मतदाताओ की संख्या का आंकड़ा राज्य में करीब 37 लाख है। आंकड़ों के मुताबिक, 8 लाख 42 हजार बेरोजगार राज्य में पंजीकृत हैं।
महिलाओ की बेरोजगारी दर 7.6 फीसद की है। नौ फीसद योग्य ग्रेजुएट, नौकरी के लिए बेरोजगार घूम रहे हैं। राज्य में बेरोजगारी दर का आंकड़ा देश मे सबसे ज्यादा है। युवाओ की ही राज्य मे सबसे बड़ी, मतदाता संख्या भी है, जो चुनाव में निर्णायक भूमिका अदा कर सकती है।
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