उत्तराखंड की विश्व-विख्यात लोक धरोहर होली गीत-संगीत में झूमा उत्तराखंडी प्रबुद्ध प्रवासी जनमानस

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सी एम पपनैं

नई दिल्ली। आधुनिक दौर में परंपरागत संस्कृति का क्षय धीरे-धीरे होता दिख रहा है। फिर भी, दिल्ली एनसीआर मे रच बस गए, उत्तराखंडी प्रवासी बन्धुओ द्वारा, अंचल की समृद्ध सांस्कृतिक होली गायन परंपरा व उसके आयोजन को छोड़ा नही गया है। उत्तराखंडी प्रवासी बहुल इलाकों मे छुटपुट रूप से प्रवासी जन इकठ्ठा होकर, बैठ व खडी होली गायन की महफिल सजा, होली के गूंजते गानों में सरावोर हो, विभिन्न राग आधारित शास्त्रीय गायन होली परंपरा परिपाठी को संजोए हुए हैं, जो सुखद लगता है।

होली के गीत-संगीत से सरावोर, भव्य होली मिलन कार्यक्रम, का एक ऐसा ही आयोजन, 16 मार्च की सांय, कालका जी एक्सटैंसन, नई दिल्ली मे, उत्तराखंड के सु-प्रसिद्ध व्यवसायी, समाज सेवी व विश्व ब्राह्मण संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष, के सी पांडे व उनकी धर्मपत्नी डाॅ कला पांडे के सौजन्य से, उत्तराखंड के सु-विख्यात लोकगायक, शिवदत्त पंत के निर्देशन मे, आयोजित किया गया।

होली मिलन के इस गीत-संगीत आयोजन मे, दीपा पंत, भुवन रावत, पन्नू गुसाई, रमेश नोटियाल, टी सी उप्रेती, वीना उप्रेती, श्री पंत जी (सेवानिर्वत एवीएम), गायिका पनुली देवी (कोसानी) इत्यादि द्वारा गाए गए होली गीतों ने, आमन्त्रित होली गीत-संगीत रसिक अतिथियों मे, जी एस रावत (उद्योगपति), वी सी त्रिपाठी (पूर्व चैयरमैन गेल), हेम पांडे (आईएएस, सचिव भारत सरकार), डी डी मिश्रा (निर्देशक एचआर, ओएनजीसी), रतन सिंह (आयकर आयुक्त), स्वामी पी भी एस के सिम्हाया जी महाराज (तिरुपति मंदिर पीठाध्यक्ष), नरेन्द्र सिंह लड़वाल (प्रमुख समाजसेवी), प्रदीप टम्टा (राज्यसभा सांसद), अजय टम्टा (लोकसभा सांसद), ललित मोहन नेगी तथा प्रदीप वेदवाल (एसीपी दिल्ली पुलिस), भुवन जोशी (संसद सुरक्षा अधिकारी), रविंद्र जोशी (जीएम आईडीपीएल), कैलाश चंद्र पांडे (सु-विख्यात जादूगर), गोपाल उप्रेती (बगान विशेषज्ञ), पी सी नैनवाल (उद्योगपति), सुनील नेगी (वरिष्ठ पत्रकार), नीरज बवाडी (प्रमुख, बिजनिश उत्तरायणी), दिनेश फुलारा (उद्योगपति) इत्यादि को आनंदित कर, होली के गीत-संगीत मे झूमने को मजबूर किया।

उत्तराखंड के सु-विख्यात जादूगर, कैलाश चंद्र पांडे के अचंभित कर देने वाले जादुई कारनामो व टी सी उप्रेती (उद्योगपति) के द्वारा, गुंजायमान होली आशिर वचनो-
हो हो होलक रे… बरस दिवाली बरसे फाग… आज का बसंत कै का घरो…. आज का बसंत के सी पांडे जी का घरों… इनरो पूत परिवार जियो लाख सौ भली… हो हो होलक रे…के साथ ही होली मिलन व गीत-संगीत के इस भव्य व यादगार आयोजन का समापन हुआ।

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दिल्ली प्रवास मे, उत्तराखंडी प्रवासी जनो द्वारा आयोजित, होली आयोजनों मे, मौजूद पारंपरिक परंपराओ और शास्त्रीय राग-रागनियों मे डूबी, होली गायन के अवसर पर, विभिन्न समाजो से जुड़े प्रबुद्ध संस्कृति प्रेमियों को होली गीत-संगीत की धुन मे रम कर, गाते-झूमते व सराहते देख, सकुन मिलता है। इसी सकुन की प्राप्ति, के सी पांडे व उनकी धर्मपत्नी डाॅ कला पांडे द्वारा आयोजित, भव्य होली मिलन आयोजन मे, बडी संख्या में, देर रात्रि तक जमे रहे, सभ्रांत आमान्त्रित अतिथियों के मध्य देखा गया।

उत्तराखंड के प्रवासी बन्धुओ के लिए, दिल्ली प्रवास मे, होली खुशियों की सौगात लेकर आती है। अंचल के प्रवासी जनों के लिए होली रंगों के साथ-साथ रागों के संगम का अनूठा महापर्व है। दो माह तक प्रवासी बन्धु अपने घरों मे बैठकी होली का उत्साह पूर्वक आयोजन कर न सिर्फ भरपूर आनंद की अनुभूति प्राप्त करते हैं, उत्तराखंड की इस समृद्ध लोकगायन व संगीत विधा का संवर्धन व संरक्षण भी करते नजर आते हैं।

उत्तराखंड की बैठकी व खड़ी होली, सांस्कृतिक विशेषता के तहत, पूरे देश व वैश्विक फलक पर जानी जाती है। विभिन्न रागों पर आधारित, शास्त्रीय गायन बैठकी होली मे, ब्रज के साथ-साथ उर्दू का भी प्रभाव भी इस होली गायन मे झलकता है। इस गायन लोकविधा ने हिंदुस्तानी गीत-संगीत को समृद्ध करने के साथ-साथ, समाज को एक नई समझ भी दी है। इस विशेषता के कारणवश इस होली का अपना ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है।

समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं के नाते, उत्तराखंडी गायन होली का प्रचलन व ख्याति, सिर्फ उत्तराखंड तथा दिल्ली मे प्रवासरत उत्तराखंडियो तक ही सीमित न रह कर, बढ़ते भू-मंडलीकरण के दौर मे, राष्ट्रीय व अन्तर्रराष्ट्रीय फलक पर भी, उत्तराखंड के प्रवासी जनों के साथ-साथ अन्य समाज के लोगों के बीच भी, प्रभावशाली पैठ जमाए हुए है।

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उत्तराखंड की बैठकी होली कद्रदानो व कलाकारो दोनों का साझा मंच रहा है। दिल्ली प्रवास मे, उत्तराखंडी होली का शुभारंभ ऐतिहासिक रहा है। देश के गृहमंत्री रहे, भारत रत्न स्व.पंडित गोबिंद बल्लभ पंत के सरकारी आवास पर, आयोजित होने वाले, होली समारोह से, दिल्ली प्रवास मे उत्तराखंड के होली गीत-संगीत का शुभारंभ माना जाता है। जिसका क्रम नब्बे के दशक तक लाल किले के प्रांगण तक पहुच, निर्बाध चलायमान रहा। प्रति वर्ष बिना आयोजको वाले इस होली उत्सव का समापन उत्तराखंड के प्रवासी जनों द्वारा, छलड़ी के दिन लालकिले के प्रांगण मे सूर्य अस्त होने के साथ, साज-बाज की गूंज के मध्य, कर दिया जाता था।

सन 1974 से, मंडी हाउस स्थित, श्रीराम भारतीय कला केंद्र द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित ख्यातिप्राप्त राष्ट्रीय होली महोत्सव जो विगत 2015 तक, निर्बाध आयोजित किया जाता रहा, उक्त होली उत्सव में उत्तराखंड की सु-विख्यात सांस्कृतिक संस्था पर्वतीय कला केंद्र द्वारा, उत्तराखंड की पारंपरिक खड़ी होली ने राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावशाली धाक जमाए रखी थी।

अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते, उनके आवास पर आयोजित होली उत्सव मे भी, पर्वतीय कला केंद्र दिल्ली को, खड़ी होली की धूम मचाने का अवसर मिला था। उक्त खड़ी होली मे अटल सरकार के कैबिनट मंत्रियों, विपक्षी दलों के नेताओ, अनेक राज्यो के मुख्यमंत्रियों तथा कैबिनेट सचिव तथा अन्य जानेमाने पत्रकारो को नाचते-झूमते देखा जा सकता था। विश्व के अनेक देशों मे भी, इस संस्था द्वारा, उत्तराखंड की पारंपरिक होली गीत-संगीत का मंचन, सु-विख्यात रंगमंच संगीत निर्देशक स्व.मोहन उप्रेती के निर्देशन में मंचित कर, होली गायन की इस समृद्ध विधा को अंतरराष्ट्रीय फलक पर ख्याति दिलवाई थी।

पारंपरिक तौर पर, उत्तराखंड के पहाड़ी अंचल मे, होली पर्व को बैठकी होली व खड़ी होली के साथ-साथ, बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप मे तथा, पहाड़ो मे ठिठुरती कड़क ठंड के अंत और खेतो मे नई बुआई के मौसम की शुरुआत के प्रतीक रूप मे, उमंग व हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है।

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पारंपरिक तौर पर, उत्तराखंड मे माह पौष से बैठकी गायन होली का शुभारंभ कर, फाल्गुन तक गाया जाता है। जिसके तहत, पौष से बसंत पंचमी तक आध्यात्मिक, तथा बसंत पंचमी से शिव रात्रि तक, अर्धश्रंगारिक और उसके बाद श्रंगार रस में डूबी होली गायन की परंपरा का प्रचलन रहा है। होली गायन के रसो मे भक्ति, बैराग्य, विरह, कृष्ण गोपियों की हंसी ठीठोली, प्रेमी-प्रेमिका की अनबन, देवर-भाभी की छेड़छाड़ इत्यादि के रसो का, तानाबाना होता है। इस होली गायन मे वात्सल्य, श्रंगार व भक्ति रस की, एक साथ मौजूदगी, इसकी मुख्य विशेषताओं मे स्थान रखती है।

गायन मे शास्त्रीय राग दादरा और ठुमरी ज्यादा प्रचलित रही हैं। होल्यार हारमोनियम के मधुर सुरो, तबले व हुड़के की थाप तथा मंजीरे की खनक पर, बैठकी होली मुक्त कंठ से भाग लगा गाते हैं, जिस पर श्रोता गण झूम उठते हैं। राग धमार से होली गायन का आह्वान किया जाता है। राग श्याम कल्याण से बैठकी होली की शुरुआत व राग भैरवी से होली बैठकी के समापन की परंपरा का पालन होल्यारों द्वारा किया जाता है।

राग आधारित शास्त्रीय गीत-संगीत बैठकी होली परंपरा की शुरुआत, पंद्रहवी शताब्दी मे चंपावत के चंद राजाओं के महल तथा इसके आसपास के क्षेत्रो से मानी जाती है। माना जाता है, चंद वंश के राज्य विस्तार के साथ-साथ, शास्त्रीय होली गायन विधा का भी क्षेत्र, विस्तृत होता चला गया। जिसका मुख्य केंद्र बाद के वर्षो मे अल्मोड़ा बन गया था। स्मृद्धि की ओर बढ़, यह गायन विधा, एक परंपरा सी बन गई थी, जिसका पालन कद्रदान व कलाकार आयोजित होली महफिलों मे वर्तमान तक करते चले आ रहे हैं। जिसका नजारा, कुछ हद तक, सु-विख्यात लोकगायक शिवदत्त पंत की होली मंडली द्वारा, विगत रात्रि, उनके गीत-संगीत मे, देखने-सुनने को मिला।
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