‘उत्तराखंड मे कैसा हो भू-कानून और परिसीमन का क्या हो आधार’ विषय पर ‘उत्तराखंड चिंतन’ द्वारा आयोजित गोष्ठी सम्पन्न

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सी एम पपनैं

नई दिल्ली। उत्तराखंड के सरोकारों पर तत्पर रही, सामाजिक संस्था, ‘उत्तराखंड चिंतन’ द्वारा, 1 मई, 2022 को ‘उत्तराखंड मे कैसा हो भू कानून और परिसीमन का क्या हो आधार’, ज्वलंत विषयों पर, अल्मोड़ा भवन साउथ एक्सटैंसन मे, संस्था अध्यक्ष विनोद रावत की अध्यक्षता तथा उत्तराखंड, विभिन्न प्रवासी जन संगठनो से जुडे प्रबुद्ध जनों की उपस्थिति में, गोष्ठी आयोजित कर, गहन मंथन किया गया।

मुख्य वक्तताओ, वरिष्ट पत्रकार डाॅ हरीश लखेडा तथा का.पुरुषोतम शर्मा का, आयोजकों द्वारा पुष्प गुच्छ व शाल ओढा कर, स्वागत, अभिनंदन किया गया। वक्तताओ द्वारा, आयोजित गोष्ठी विषय पर सारगर्भित, तथ्यपूर्ण विचार व्यक्त किए गए। व्यक्त किया गया, उत्तराखंड मे उक्त मुद्दों पर आवाज क्यों उठाई जा रही है? आंदोलन क्यों चलाऐ जा रहे हैं? सवाल खड़े करता, नजर आता है। शासन प्रशासन को चेताना व यह बताना जरूरी है, कि ‘उत्तराखंड मे कैसा हो भू-कानून और परिसीमन का क्या हो आधार’।

मुख्य वक्ताओ द्वारा व्यक्त किया गया, पहले से ही मांग उठती रही है, हिमाचल की तर्ज पर भू-कानून लागू हो। आश्चर्य, उक्त कानून नही लाया गया। उत्तराखंड पर्वतीय अंचल के चप्पे-चप्पे पर, बाहरी लोगों द्वारा, बडी तादात पर जमीन कब्जाई जा रही है। साठ-गांठ कर मालदारों को पब्लिक स्कूल व निजी अस्पताल इत्यादि खोलने के लिए, एक रुपया की दर पर, जमीन बांटी गई है। समय-समय पर काबिज सरकारों द्वारा, बाहरी मालदारो के हक मे, जमीन खरीद-फरोख़्त के कानून बदलते रहे हैं। सवाल खड़ा होता है, जब मूल वाशिंदों के पास जमीन ही नहीं रहेगी तो, लोकसंस्कृति का भी लोप हो जायेगा। बाहरी संस्कृति का बोलबाला हो जायेगा। विकास के नाम पर, हिमालयी पर्यावरण का विनाश होगा।

मुख्य वक्ताओ द्वारा अवगत कराया गया, देश के अनेकों राज्यो में, सख्त भू-कानून लागू हैं। बाहरी लोग जमीन की खरीद-फरोख़्त नहीं कर सकते हैं। स्थानीय लोगों के पास ही, खरीद-फरोख़्त के अधिकार सुरक्षित हैं। देश के विभिन्न राज्य जमीन खरीद-फरोख़्त के कानून के बावत, सख्त व तटस्थ बने हुए हैं। उत्तराखंड की जमीन को कैसे बचाया जाए? कैसे जनजागृति लाई जाए, उक्त तथ्यों पर विचार व्यक्त कर, लोगों से आहवान किया गया, राज्य के लोग, बाहरी लोगों को जमीन न बेचै।

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व्यक्त किया गया, उत्तराखंड राज्य का गठन होते ही, प्रदेश के लोगों के साथ, धोखाधड़ी व उनकी परेशानियां बढ़नी आरंभ हो गई थी। परिसीमन पर सवाल उठने लगे थे। हरिद्वार को मिलाने से, राज्य की बीस फीसद आबादी मे इजाफा हो गया था। बीस फीसद लाभ जो अंचल को मिलना चाहिए था, वह वंचित हो गया था। आने वाले समय में जो परिसीमन होगा, उससे पहाडी राज्य की अवधारणा ही समाप्त हो जायेगी।

वक्ताओ द्वारा व्यक्त किया गया, अंचल के लोगों की राजनीति व समझ जो बनाई जा रही है, खतरनाक है। इसको जम्मू-कश्मीर से अगर जोड़कर देखा-परखा जाए तो, उत्तराखंड के परिपेक्ष मे, स्थित साफ दृष्टिगत होती नजर आती है। जिस पर राज्य का आम व जागरूक जनमानस चुप है। राज्य गठन, पलायन के लिए नहीं, पलायन रोकने के लिए किया गया था। अंचल के जनमानस को क्या मिल रहा है, सोचना होगा। समझना होगा, पहाड़ क्यों खाली हो रहे हैं। कोंन अंचल के दोस्त व दुश्मन हैं। नेता वे बने हैं, जिनका न तो उत्तराखंड आंदोलन से कोई वास्ता रहा है, न ही अंचल के जनसरोकारों के लिए, उनकी कोई सोच है।

व्यक्त किया गया, राज्य का परिसीमन, आबादी नहीं, क्षेत्रफल के मुताबिक होना चाहिए। समझना होगा, यह मसला राज्य ही नहीं, केन्द्र से भी जुड़ा हुआ है। सभी पर्वतीय राज्यो व आदिवासी क्षेत्रों के लिए, एक नीति बननी चाहिए। सभी पर्वतीय राज्यो को एक साथ लाना होगा।

व्यक्त किया गया, 1923 मे, बीस फीसद कृषि भूमि अंचल के लोगों के पास थी। 1958-64 के बाद से, अंचल की जमीन के सही आंकड़े सरकार के पास नहीं हैं। किए गए बन्दोबस्त मे, जमीन काफी निकल गई। 1960 में, जमीनदारी विनाश कानून बना था। लोगों को जमीन का हक मिला व उनके नाम चढ़ा था। कूजा एक्ट बनने पर, लोगों व पंचायत के हक छीने गए। बेनाम जमीन का हक सरकार के पास गया, जो अभी भी कायम है। ग्राम पंचायत के हक सीमित व कृषि भूमि स्थिर हो गई है। विकास योजनाऐ ग्रामीणों की भूमि में बनाई जा रही हैं। आज हालात ऐसे बन गए हैं कि, काश्त्कारो के पास, लगभग दस नाली जमीन ही शेष बची हुई है। जो लोगों की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार रही है। पशु पालन मुख्य रहा है। राज्य का 70 फीसद दुग्ध उत्पादन, पशु पालक ही करते हैं। वर्ष 2000 मै जितने जानवर पाले जा रहे थे, वर्तमान मे उनकी संख्या मात्र 35 फीसद रह गई है। बैल ग्रामीण क्षेत्रों से लगभग नदारद हो गए हैं। खेत बन्जर हो गऐ हैं। पशु कम होने से चरागाहों मे झाड़ियाँ उग आई हैं। जंगली जानवर उनमे पनाह ले रहे हैं। जंगल की आग, उक्त झाड़ियों तक पहुच, खेतों मे खडी फसलों को नुकसान पहुंचा रही है। नई रेल परियोजनाऐ, घाटी की कृषि उपजाऊ जमीन को हडप रही हैं। पलायन आयोग के मुताबिक विगत दस वर्षो मे अंचल के ग्रामीण क्षेत्रों से बत्तीस लाख लोग पलायन कर चुके हैं। परंपरागत जैविक बीजो के स्थान पर नया बीज कानून लाया जा रहा है। बीज महंगे हो गए हैं। स्थापित सरकारों द्वारा, कार्पोरेट धन्धा स्थापित करने के रास्ते, बनाऐ जा रहे हैं।

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व्यक्त किया गया, आज जमीन की कोई सीलिंग नहीं रह गई है। कानून पूंजीपतियों के हित में बनाऐ जा रहे हैं। बडे पूंजीपति लम्बी व मन माफिक अवधि के लिए, लीज पर जमीन विभिन्न तरह के उपयोग हेतु ले रहे हैं। यह सब जमीन हडपने की साजिश के तहत हो रहा है। सरकार और चुने हुए प्रतिनिधि, अगर स्थानीय ग्रामीणों के सरोकारो हेतु, आगे नहीं आती है तो, जमीन नहीं बच पायेगी। स्थानीय जनों को ज्वलंंत व भविष्य के चुनौतीपूर्ण मुद्दो पर संकुचित दृष्टिकोण छोड़ आगे आना होगा।

व्यक्त किया गया, व्याप्त राजनैतिक खेल व मंशा को देख-परख, भू-कानून के बावत, आज की पीढी को जानना व समझना आवश्यक है कि, पहले कृषि भूमि बचे व उसका विस्तार हो। हिमालयी राज्य के वन कानून शिथिल हो। बेनाम बन्जर भूमि ग्राम पंचायतो के द्वारा, जरूरत मंदो को बांटी जाए। इन सबके लिए भूमि कानून लाना होगा।

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मुख्य वक्ताओ द्वारा भू-कानून व परिसीमन पर व्यक्त व सुझाए गए तथ्यों पर प्रेमाधोनी, धीरेन्द्र प्रताप, अनिल पंत, रजनी ढोंडियाल, उमेश खंडूरी, कुसुम कंडवाल भट्ट, चंद्र मोहन पपनैं, रमेश चंद्र घिन्डियाल, सुरेन्द्र सिंह हालसी, कुसुम चौहान, कुसुम बिष्ट, एस पी गौड़, महेंद्र सिंह बोरा, प्रताप सिंह शाही, देवेन्द्र सिंह बिष्ट द्वारा, कुछ आवश्यक सुधारों पर गूढ व तथ्य परख राय व्यक्त की गई। प्रवासी प्रमुख समाज सेवी प्रेमा धोनी द्वारा अवगत कराया गया, भू-कानून पर बिगत महीनों से हस्ताक्षर अभियान भी चलाया जा रहा है, जिस पर प्रवासी बंधुओ द्वारा अपार समर्थन व सहयोग दिया जा रहा है।

गोष्ठी संचालन कर रहे वरिष्ठ लेखक-पत्रकार, सुरेश नोटियाल द्वारा व्यक्त किया गया, आज ‘उत्तराखंड चिंतन’ के बैनर तले, भू-कानून व परिसीमन पर जो भी मंथन व चर्चा की गई, वक्ताओं के विचार व महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए हैं, उन सबको प्राथमिकता देकर, राज्य व केन्द्र सरकार को जनसरोकारों के हित में, प्रेषित किया जायेगा। उत्तराखंड के सरोकार के लिए, कुछ भी करना पडे, हम सबको एकजुट होकर, सदैव तैयार रहना होगा।

गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ समाजसेवी व आयोजक संस्था अध्यक्ष, विनोद रावत द्वारा, गोष्ठी मे शामिल, मुख्य वक्ताओ व उपस्थित सभी साधकों का, गोष्ठी मे सम्बंधित ज्वलंत विषयों पर, मंथन कर, सुझाव देने व विचार व्यक्त व्यक्त करने पर, आभार व्यक्त किया गया। उत्तराखंड की दशा व दिशा पर व्यक्त किया गया, जो भी अंचल के पर्वतीय क्षेत्र मे घटित हो रहा है, जिम्मेवार हम स्वयं हैं। जमीने हमने खुद बेची हैं। लोगों ने खेती-किसानी में आ रही जटिलता के कारणवश, खुद ही काम करना छोड़ दिया है। आज जरूरत है, एकजुट होकर, चकबंदी हेतु, आंदोलन की।अध्यक्ष द्वारा किए गए संबोधन के साथ ही गोष्ठी का समापन किया गया।
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