राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय रानीखेत में अखिल भारतीय शिक्षा समागम–2026 के अंतर्गत विद्यार्थियों ने जाना शोध, बौद्धिक संपदा, पेटेंट और उद्यमिता का महत्व

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रानीखेत-युवाओं के विचार केवल कक्षाओं और पुस्तकों तक सीमित न रहें, बल्कि शोध, नवाचार, पेटेंट और स्टार्ट-अप के माध्यम से समाजोपयोगी समाधान और रोजगार के नए अवसरों का आधार बनें—इसी उद्देश्य के साथ राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रानीखेत में अखिल भारतीय शिक्षा समागम–2026 के अंतर्गत “नवाचार एवं स्टार्ट-अप प्रदर्शन” विषय पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया।

कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों में जिज्ञासा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, शोध-दृष्टि, रचनात्मक चिंतन, पेटेंट जागरूकता और उद्यमिता की भावना विकसित करना तथा उन्हें अपने विचारों को व्यावहारिक रूप देने के लिए प्रेरित करना रहा। वक्ताओं ने विद्यार्थियों को संदेश दिया कि शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं होनी चाहिए। अपने आसपास की समस्याओं को पहचानना, उन पर प्रश्न करना और शोध एवं नवाचार के माध्यम से नए समाधान तलाशना ही नवाचार की वास्तविक शुरुआत है।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. निधि शर्मा एवं डॉ. रेखा भट्ट ने संयुक्त रूप से किया। उन्होंने कार्यक्रम की विषय-वस्तु को शोध, नवाचार, बौद्धिक संपदा और उद्यमिता की एक क्रमिक यात्रा के रूप में प्रस्तुत करते हुए विद्यार्थियों को कार्यक्रम के विभिन्न आयामों से परिचित कराया।

रसायन विज्ञान विभाग के डॉ. भारत पांडेय, जिनके नाम सात पेटेंट हैं, ने पूर्व राष्ट्रपति एवं महान वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के प्रेरक विचार—“Dream, dream, dream. Dreams transform into thoughts and thoughts result in action.”—से अपने व्याख्यान की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि प्रत्येक बड़ा आविष्कार कभी एक छोटे-से विचार के रूप में ही जन्म लेता है। आवश्यकता उस विचार में छिपी संभावना को पहचानने, शोध के माध्यम से उसे विकसित करने और उचित समय पर उसे बौद्धिक संपदा के रूप में सुरक्षित करने की है। विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए उन्होंने कहा—“सोच आपकी, शोध आपका—तो अधिकार भी आपका।”
डॉ. भारत पांडेय ने पेटेंट की अवधारणा को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाते हुए बताया कि केवल कोई नया विचार मन में आ जाना पेटेंट के लिए पर्याप्त नहीं है। उस विचार को मौलिक, उपयोगी और व्यावहारिक आविष्कार के रूप में विकसित करना आवश्यक है। उन्होंने विद्यार्थियों से अपने आसपास की समस्याओं को केवल कठिनाई के रूप में नहीं, बल्कि शोध और नवाचार के अवसर के रूप में देखने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी जीवन में जन्म लेने वाला एक छोटा-सा विचार भी सही शोध और मार्गदर्शन मिलने पर भविष्य में पेटेंट, उपयोगी उत्पाद अथवा स्टार्ट-अप का आधार बन सकता है।

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रसायन विज्ञान विभाग के डॉ. प्रसून जोशी ने पेटेंट, कॉपीराइट एवं ट्रेडमार्क सहित बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि मौलिक शोध और नवाचार को उचित रूप से संरक्षित करना आवश्यक है, ताकि शोधकर्ता अपने बौद्धिक श्रम एवं सृजन पर अधिकार सुरक्षित रख सकें तथा अपने नवाचार को समाज और उद्योग के हित में आगे विकसित कर सकें।

अंग्रेजी विभाग की डॉ. बरखा रौतेला ने परियोजना एवं शोध-आधारित कार्यप्रणाली पर चर्चा करते हुए विद्यार्थियों को अपने विचारों को योजनाबद्ध ढंग से परियोजनाओं में परिवर्तित करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि प्रोजेक्ट-आधारित अध्ययन विद्यार्थियों में रचनात्मकता, समस्या-समाधान क्षमता, शोध-दृष्टि और व्यावहारिक कौशल विकसित करने का प्रभावी माध्यम है।

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संस्कृत विभाग की डॉ. बबीता कंडपाल ने “अनुसंधान की भूमिका एवं उसका सामाजिक प्रभाव” विषय पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने शोध को समाज की वास्तविक आवश्यकताओं से जोड़ने पर बल देते हुए कहा कि अनुसंधान की सार्थकता तभी बढ़ती है, जब उसके परिणाम समाज की समस्याओं के समाधान और जीवन की गुणवत्ता में सुधार के लिए उपयोगी सिद्ध हों।

कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने अपने नवाचारी विचारों एवं शोध कार्यों का प्रस्तुतिकरण भी किया। प्रस्तुत विचारों के व्यावहारिक उपयोग, सामाजिक प्रासंगिकता तथा भविष्य में उन्हें परियोजना, पेटेंट, उत्पाद अथवा स्टार्ट-अप में परिवर्तित करने की संभावनाओं पर चर्चा की गई। इससे विद्यार्थियों को यह समझने का अवसर मिला कि शोध केवल प्रयोगशाला अथवा शोध-पत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि समाजोपयोगी नवाचार और उद्यमिता का आधार भी बन सकता है।

कार्यक्रम का प्रमुख संदेश रहा कि जिज्ञासा से विचार, विचार से शोध, शोध से नवाचार, नवाचार से बौद्धिक संपदा और बौद्धिक संपदा से स्टार्ट-अप एवं रोजगार-सृजन की संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं। इस पूरी प्रक्रिया को विकसित भारत@2047 के संकल्प से जोड़ते हुए विद्यार्थियों को ज्ञान-आधारित, नवाचार-प्रधान एवं आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया गया।

महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. पुष्पेश पांडेय ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए विद्यार्थियों को शोध, नवाचार एवं उद्यमिता के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि उनमें नई सोच, शोध की प्रवृत्ति और समाजोपयोगी नवाचार की क्षमता विकसित करना भी है। कार्यक्रम की सह संयोजक डॉ लक्ष्मी देवी ने कार्यक्रम के उद्देश्यों को विद्यार्थियों के भविष्य से जोड़ते हुए इस प्रकार के आयोजनों को युवाओं में नवाचार और उद्यमिता की संस्कृति विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण बताया। कार्यक्रम संयोजक डॉ. निधि शर्मा ने कार्यक्रम की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए सभी वक्ताओं, सहयोगियों एवं प्रतिभागियों के योगदान की सराहना की।

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इस अवसर पर डॉ. रश्मि रौतेला सहित विज्ञान, कला एवं वाणिज्य संकाय के शिक्षकगण तथा बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में वक्ताओं एवं प्रमुख सहयोगियों को प्रतीक-चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया गया।

अंत में डॉ. सत्यमित्र सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने प्राचार्य, नोडल अधिकारी, कार्यक्रम संयोजक, वक्ताओं, महाविद्यालय प्रशासन, शिक्षकगण एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा—

“विचार को प्रश्न में बदलिए, प्रश्न को शोध में, शोध को नवाचार में, नवाचार को बौद्धिक संपदा में और बौद्धिक संपदा को समाजोपयोगी उद्यम में परिवर्तित कीजिए। यही विचार से कार्य की यात्रा है और यही युवा शक्ति को विकसित भारत@2047 के निर्माण से जोड़ने का मार्ग है।”

कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि “विचार से शोध, शोध से नवाचार, नवाचार से पेटेंट और पेटेंट से स्टार्ट-अप”—यही युवा सोच को अवसर, रोजगार और राष्ट्रनिर्माण से जोड़ने की सशक्त यात्रा है।

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